कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

मेरे मालिक - 1 - आइडियल एक्‍सप्रेस - बनारस - नौकरी के संस्‍मरण

अब तक कुल दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुका हूं मैं तो वहां के कुछ संस्‍मरण मेरे मालिक सीरीज में...

यह चौरानबे पिचानबे की बात होगी। 28-29 का रहा होउंगा। विवाह हो चुका था एक बेटा एक साल का। अखबारों में लिखता था खूब,हिन्‍दुस्‍तान में एक-एक पेज की कवर स्‍टोरी आती थी और फीचर आदि लिखता रहता था। किसी भी विषय पर कलम चला देने की महारत थी। पर इस सब से काम नहीं चल पा रहा था। इसी बीच एक दिन हिन्‍दुस्‍तान के दफ्तर में श्रीकांत जी ने पूछा कि नौकरी करनी है। मैंने पूछा - कहां। तो वे तैश में बोले कि यह बोलो कि करनी है कि नहीं। मैंने कहा- हां करनी है। तब वे बोले - तो कल बनारस चले जाओ।
मैं सोचने लगा कि अचानक यह बनारस। पर वे तपाक से बोले-अखबार में काम करना है तो इस तरह सोचना छोडो। जाओं बोरिया बिस्‍तर तैयार करो। पता चला कि हिन्‍दुस्‍तान के ही एक तिवारी जी वहां संपादक बन कर जा रहे हैं। तिवारी जी उम्र में हमसे एकाध साल ही बडे थे। परिचय था हल्‍का सा। उनकी भी यह नयी नौकरी ही थी पर कुछ गोटी फिट थी उनकी सो हो गये संपादक।
तो दूसरे दिन हम भी बनारस नगरी में नमूदार हो गये। वहां गये तो दो तीन और मित्र पटना के वहां आ चुके थे मेरी तरह के फ्रीलांसर। दीपक, विनय आदि। वहां से एक साप्‍तहिक आरंभ हो रहा था उसके सलाहकार संपादक जनकवि त्रिलोचन हैं यह सूचना श्रीकांत ने मुझे उत्‍साहित करने को दे दी थी। वहां गया तो पता चला कि अभी सबके ठहरने की व्‍यवस्‍था एक साथ है। दो बडे कमरे अखबार के मालिक ने दे दिये थे और पास ही अखबार का दफ्तर था एक सिनेमा हॉल के उपर।
बडा मजा आ रहा था। पूरी टीम एक साथ रह रही थी1 एकाध शाम खाना मालिक की तरफ से ही आ गया। फिर तय हुआ कि अभी एकाध महीना इसी कमरे में रह सकते हैं सब फिर अपना अपना ठिकाना अलग कर लिया जाएगा। तो हास्‍टल लाइफ का मजा मिलने लगा हमें। साप्‍ताहिक था तो उस तरह काम का दबाव नहीं था। फिर हमलोग ट्रेनी थे। पहली नौकरी में। पहुंचने के अगले दिन सुबह दस बजे हमलोग दफ्तर पहुंचे तो पहले हमारा टेस्‍ट लिया गया। एक सज्‍जन थे युवा से ही मीठे स्‍वभाव के,मालिक जमात से, उन्‍हीं के मुका‍बिल था मैं। कई सवालों के बाद उन्‍होंने पूछा क्‍या क्‍या लिख लेते हैं आप। मैंने कहा - फीचर,रपट,समीक्षा आदि सबकुछ।
फिर वे बोले समीक्षा कितनी देर में कर लेते हैं। मैंने सोचा फिर कहा- यह किताब पर निर्भर करता है। सप्‍ताह भर, एक दिन और जरूरत पडी तो एक घंटे में भी। वे मुस्‍कुराये - आखबारी ट्रेनिंग थी हमारी , माने कुछ भी असंभव नहीं। उनके पास तसलीमा नसरीन का कविता संग्रह था एक। वह थमाते उन्‍होंने कहा इसकी समीक्षा कर के ले आइए। मैंने सोचा अच्‍छी मुसीबत है अब तक समीक्षा के लिए किताबें लेने पर कम से कम एक सप्‍ताह का समय मिलता था। इन्‍हें यहीं चाहिए। मैंने सोचा अच्‍छा नमूना आदमी है, पर मुस्‍कुराते हुए किताब उठायी और सामने टेबल पर बैठ गया। करीब तीन घंटे लगे और समीक्षा पूरी हो गयी। दरअसल कविताएं अच्‍छी थीं कुछ पहले से पढ ही रखा था तसलीमा को। उसके तीखे तेवर खींचते थे - मेरी बडी इच्‍छा होती है लडका खरीदने की/उन्‍हें खरीदकर,पूरी तरह रौंदकर सिकुडे अंडकोश पर/जोर से लात मारकर कहूं/भाग स्‍साले।

फिर प्रेम की अंतरलय भी तरीके से अभिव्‍यक्‍त की थीं तसलीमा ने - पूरा जीवन सूना था...तुम इस तरह उडेल दे रहे हो...खींच ले रहे हो इतने पास...इतना तो मेरा प्राप्‍य नहीं थ।

सो लिखकर शीर्षक लगाया मैंने - सौंदर्य व हस्‍तक्षेप के नवबोध की नई भाषा। तो जब मैंने समीक्षा दी सज्‍जन को तो वे चौंके और खुश हुए। वह समीक्षा अब पंद्रह साल बाद आनेवाली आलोचना की किताब में संकलित है तो लगता है कि वहां मैं अखबार के साथ अपना काम भी कर गया था।
तो अब मैं नौकर था। साप्‍ताहिक था तो दिन में काम नहीं होता खास। समय काटने को अक्‍सर अंग्रेजी से अनुवाद को कोई पीस थमा दिया जाता। मेरा सिर भन्‍ना जाता। जब अखबार का पहला अंक आया तो उसमें आठ अनुवाद मेरे थे। मुझे लगा कि ये तो जान मार देंगे ससुरे। आगे से अखबार की नौकरी में अनुवाद ना करने की नीति बना ली मैंने और उस पर अमल भी किया। इसके लिए अनुवाद तो करता पर उसे इतना मौलिक बना देता कि संपादक को बर्दाश्‍त नहीं होता था फिर वह हमें अनुवाद का काम नहीं देता था।

पहली बार वहां मैंने अखबार के कुछ काम सीखे। हेड्रिग लगाना,इंट्रो लिखना आदि। कंपोजिंग के लिए अलग सेक्‍शन था सो यह सिरदर्द आजे के अखबारों की तरह नहीं था। दोपहर में खाने के बाद नींद आने लगती मुझे तब कुछ नहीं सूझता तो सामने रखी आलपीन को हाथ में चुभाता पर नींद तो नींद थी आती रहती पर आलपीन भी आलपीन थी काम करती रहती थी।

हिन्‍दुस्‍तान के मेरे काम की बडी चर्चा थी वहां। सो वे हर काम दे देते थे। रपटें भी अच्‍छी लिखता था मैं। सो कभी कभार कहीं किसी को भेजना होता तो मुझे ही तलाशते सब। मुझे वह बहादुरी का काम लगता सो मैं चला जाता दौडा। पर मैं जिददी था। समझौते नहीं जानता था आज तक नहीं जाना। सो पता चला कि एक रपट के लिए मुझे पास के एक जिलें भदोई जाना है और बाल बुनकरों के शोषण को लेकर वहां के जिलाधिकारी से सवाल जवाब करना है। तो सबसे बहादुर मैं ही समझा जाता था तो रात में मालिक की गाडी में ही जाने की व्‍यवस्‍था थी रात उसके घर में ठहरना था फिर सुबह डीएम से बात कर आ जाना था शाम तक। रात दस बजे गाडी चली बनारस से । मालिक युवा था और खुद गाडी हांक रहा था। पीछे एक आदमी और था साथ। गाडी फर्राटे से चली जा रही थी। शहर से बाहर आते समय एक जगह एक नंगा आदमी गाडी से टकराने से बचा। मैं चौंका पहली बार इस तरह निपट नंगो को मैंने देखा था सडक पर। साथ वाला आदमी समझाता जा रहा था मुझे कल की बातचीत के बारे में। मेरी उसमें कोई रूचि नहीं थी मैं सोच रहा था कि रपट मुझे लिखनी है तो यह क्‍यों माथा खा रहा है डीएम ही तो है कोई तोप है क्‍या...। अब तक मायावती,लालू प्रसाद,नीतीश आदि तमाम राजनेताओं से दर्जेनों मुलाकातें हो चुकी थीं मेरी बातचीत आदि खेल की तरह था। ओर यह डीएम डीएम कर रहा था। यह छोटे शहर के अखबार का नतीजा था राजधानी के अखबार में तो लोग हंसेंगे कि डीएम भी कोई इंटरव्‍यू लेने की चीज है। अदना सा सरकारी नौकर है वह तो राजनीतिज्ञ आजकल उनसे खैनी लटवाने का काम करते हैं बिहार में।
तो आखिर हम आधी रात को मालिक के डेरे पर पहुंच गये। उसने हमें दालान सी एक जगह में सोने की जगह दिखा दी और खुद अपने महल में चला गया। साथ वाला आदमी भी वही साथ की चौकी पर आ गया। सुबह जगा तो देखा कि वह बडे से आहाते वाला मकान है और उसके एक सिरे पर दर्जनों बच्‍चे हैं छोटे कमरों में। पता चला कि ये बुनकर हैं। मालिक ने जिस तरह से हमलोगों को महल के बाहर छोड दिया था रात को मेरे मन में इसका गुस्‍सा था ही सो जब जिलाधिकारी से बात हुयी तो मैंने बुनकरों के मालिकों दवारा बच्‍चों के शोषण को लेकर कुछ तीखे सवाल किये1 बाकी विकास उकास आदि को लेकर जेनरल सवाल कर मैं चला आया।
अगले दिन रपट लिखने के समय तक मुझे पता चल चुका था कि यह रपट मालिक ने अपना उल्‍लू सीधा करने को लिखवायी है सो लिखते समय मैंने पूछा संपादक से कि बुनकरों के शोषण के मामले पर भी बहुत कुछ पूछा है मैंने वह सब लिख दूं ना । संपादक ने हंसते हुए कहा हां लिख दो। मैंने लिख दिया खरा खरा1 जब संपादक ने पढा तो माथा पीट लिया। बहुत नाराज हुआ वह। पहली बार मुझे किसी ने डांटा सो मैं रूआंसा हो गया।
बाद में मुझे पता चला कि मालिक के होटल में एक बलात्‍कार हुआ था जिसमें वह भी फंसा था और उस पर केस चल रहा है। और यह अखबार इसी सब की भरापाई के लिए है। जिन त्रिलोचन जी के नाम पर आया था मैं वे कभी दिखे नहीं वहां।
तब तक काम करते एक महीना हो चुका था और इतनी लंबी नौकरी की आदत नही थी घर से दूर सो इस नाम पर छुटटी ली कि कुछ सामान लाया नही था अब घर जाकर कुछ काम के सामान आदि साथ ले आउं।
पटना गया तो वहां से पाटलीपुत्र टाइम्‍स का प्रकाशन फिर से होने जा रहा था। युवा मित्र अंजनी और रत्‍नेश्‍वर चाहते थे कि मैं भी उस अखाबार की नयी टीम मे रहूं उनके साथ। तो जाते ही एक साक्षात्‍कार के बाद मेरी नौकरी पक्‍की हो गयी1 फिर मैं अगले दिन बनारस गया सामान लेने तब वहां मुझे लेकर उत्‍साह का माहौल था। मेरा एक आलेख जो रघुवीर सहाय को लेकर था उसकी चर्चा थी , त्रिलोचन जी शहर में थे और एक गोष्‍ठी में उन्‍होंने मेरे लेख की प्रशंसा की थी कि यह लडका रामविलास शर्मा की तरह लिखता है ,यह बात मुझे संपादक ने कही। इतना काफी था मेरे खुशी में डूब मरने के लिए। पर मुझे उसी दिन लौटना था जब मैंने यह खबर संपादक को दी वह उदास हो गया। मुझे तब उसकी डांट याद आयी और मैं चमकता हुआ अपना बोरिया बिस्‍तर ले इस पहली नौकरी से छुटटी पा वापिस पटना आ गया।