कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 29 मार्च 2010

मृत्‍यु गीत - गाब्रियला मिस्‍त्राल

1945 में नोबेल से सम्‍मानित चीले की इस्‍पाहानी कवयित्री गाब्रियला मिस्‍त्राल की कविताओं से गुजरना एक आत्‍मीय अनुभव रहा। अनुपस्थिति का देश तथा अन्‍य कविताएं नामक इस संकलन की कविताओं का अनुवाद गंगाप्रसाद विमल,विनोद शर्मा और आलोक लाहड ने किया है। प्रस्‍तुत है उनकी एक कविता ...

गिन गिन कर ले जाने वाली सनातन मृत्‍यु

यह दक्ष हाथों वाली मृत्‍यु

ज‍ब निकले राह पर

न मिले मेरे बच्‍चे को


सूंधती है नवजातों को

और लेती है गंध उनके दूध की

पाये वह नमक और आटे का ढेर

न मिले उसे मेरा दूध


वह दुनिया की पूतना

जीवित लोगों को समुद्र तटों

खौफनाक रास्‍तों पर विमो‍हित करने वाली

इस अबोध को न मिले


नामकरण के साथ

विकसता है वह फूल सा

भूल जाए उसे अचूक याद वाली मौत

खो दे अपनी गणना।


कर दें उसे पागल

नमक,रेत और हवाएं

और दिग्‍भ्रमित भटके

वह पगली मौत।


कर दें उसे भ्रमित माएं और बच्‍चे

मछलियों की मानिन्‍द

और जब मेरा वक्‍त आए

वह मुझे निपट अकेली खाए।

1 टिप्पणी:

शहरोज़ ने कहा…

आप बेहतर लिख रहे हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/