शुक्रवार, 19 मार्च 2010

सबसे बडका सियार - संस्‍मरण

यह कहानी चाचा सुनाया करते थे। कहानी उस समय की है जब पिता कालेज में पढते थे। मेरा गांव सोन नदी के तट पर है। तो वह बाढ का समय था तो नदी किनारे गांव के कुछ लडके जो बाढ देखने और नहाने को वहां जमा थे , उन्‍होंने देखा कि नदी किनारे एक बडा सा जंगली जानवर थका सा बैठा है। वह कहीं से बहकर आ गया था वहां। वहां बच्‍चों ने इससे पहले ऐसा जानवर ना देखा था ना उसके बारे में जानते थे। उन्‍होंने सोचा कि यह लगता तो कुत्‍ते सियार की तरह है पर कद में बडा है। सो वे गांव लौटे तो बडों को बताया कि एक बहुत बडा सियार सोन किनारे बहकर आ गया है। उस जानवर का जिसतरह उन्‍होंने वर्णन किया उससे गांव के बडों की उत्‍सुकता जगी कि चलें देखें वह कैसा बडा सियार है।

सो वे जमात में चल दिए सोन किनारे। उस जमात में एक थे कैलाश तिवारी और दूसरे थे भंगा सिंह। दोनें मिलिट्री में थे और छुटटी आए थे दो दो महीने की। तिवारी जी ही भंगा को भगा कर ले गये थे इस नौकरी में। तो जब इन दोनों बहादुरों ने उस बडे सियार को देखा तो हंसे और बोले कि अरे इ त बाघ ह...। फिर तिवारी जी ने भंगा को कहा कि ए भंगा चल देखल जाव कि इ बघवा में कतना दम बा। अब भंगा तो और एक कदम आगे थे सो बोले हा बबा अब इ बघवा रही चाहे हमनी के रहब जा , चलीं देखल जाव।

तो सीना ताने दोनों जने चल दिए बाघ की ओर। जब वे एक लग्‍गी की दूरी पर पहुंचे तो बाघ को लगा कि दोनों महाशय उनकी ही खैरियत पूछने आ रहे हैं सो उसने एक छलांग मारी और इनके पास आ गये और एक तबडाक लगाया पहले तिवारी बबा को फिर दूसरा तबडाक भंगा को और वे दोनों एक पर एक गिरे और अब बाघ उनके उपर जा बैठा और भीड की ओर देखने लगा कि - अब आव केकर बारी बा।

पर भीड के नायकों की जो हालत हो चुकी थी अब भला कौन बढता बाघ की ओर। इस बीच सबसे नीचे पडे तिवारी जी ने सोचा कि पता ना बघवा केने से खाए के शुरू करी। तो उन्‍होंने पूछा - कि ए भंगा तू उपर बाडस तनी हाथ हिलाके देख कि बघवा के मुंह केने बा, कि पता लागो कि उ केने से खाए के शुरू करी। भंगा ने हाथ निकाल कर जब कोशिश की तो हाथ में बाघ की पूंछ आयी। अब बाघ को लगा कि दोनों को मैंने दबा रखा है तो यह तीसरा कौन पूंछ पकड रहा है। सो वह डरकर फिर वही उछल कर जा बैठा जहां वह पहले था।

अब दोनों जवान धूर झारके उठे और बोले कि बडा जबर बाघ बा हो , चलल जाव गांव से भाला बरछी ले आवल जाव।

फिर वे सब गांव हथियार लाने चले इधर बाघ उठकर खलिहान की तरफ चला। आगे एक यादवों का टोला था जनेसरा। वहां जाकर वह पुआल के दो टालों के बीच घुस कर छुप गया। भीड जो पीछे लगी थी उसमें एक जनेसरा के यादव जी ने सोचा कि अच्‍छा मौका है बहादुरी दिखाने को सो वे आगे सो घुमकर सीधे बाघ के मुंह की ओर से उसकी गरदन पकडने को हाथ बढाये ,पर वह तो बाघ था सो कच कच उनका हाथ केहुनी तक चला गया। तब तक लोग भाल बल्‍लम लेकर आ चुके थे और उन्‍होंने उसे भोंक भांक कर वहीं मार दिया। फिर इस बहादुरी के लिए उस समय की अंग्रेज सरकार ने गांव को इनाम दिया और बाघ की छाल वही पास के गांव रेपुरा के मंदिर मे टांग दी गयी जो आज भी टंगी है।

बाघ ने जो चोट की थी उससे आगे भंगा की मौत हो गयी थी। पर तिवारी बबा जब तक जीते रहे अपनी पीठ पर बाघ के मारे का निशान दिखाते रहे।

2 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बढ़िया संस्‍मरण!
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संपादक : सरस पायस

माणिक ने कहा…

saadagee aur saarthakata ke saath likhaa hai.badhaai