गुरुवार, 18 मार्च 2010

मैं भी अमरीका का गीत गाता हूं - लैंग्‍स्‍टन ह्यूज - अनुवाद - रामकृष्‍ण पाण्‍डेय

मैं भी अमरीका का गीत गाता हूं

मैं उसका एक काला बाशिंदा हूं

जब मेहमान आते हैं

वे मुझे रसोईघर में भेज देते हैं

पर मैं हंसता हूं

और खा खा कर पेट भर लेता हूं

और पहलवान की तरह मोटा होता रहता हूं


कल जब मेहमान आएंगे

मैं सीधे मेज पर बैठ जाउंगा

और किसी की हिम्‍मत नहीं होगी कहने की

कि जाओ रसोईघर में

वहीं जाकर खाना खाओ


फिर वे देखेंगे कि

मैं कैसा जंवा मर्द हूं

और शर्म से सिर झुका लेंगे

मैं भी अमरीका का ही एक आदमी हूं


मैं भी अमरीका का गीत गाता हूं

2 टिप्‍पणियां:

Chhilki ने कहा…

अमेरिका के अश्वेत आंदोलन की सशक्त कविता है। इस कविता के जादुई अक्षर अमरीकी श्वेत दुनिया के भदेसपन और असमानता के खिलाफ तनकर खडे है।

Chhilki ने कहा…

अमेरिका के अश्वेत आंदोलन की सशक्त कविता है। इस कविता के जादुई अक्षर अमरीकी श्वेत दुनिया के भदेसपन और असमानता के खिलाफ तनकर खडे है।