बुधवार, 10 मार्च 2010
थोडा सा स्त्री होना चाहता हूं - रणेन्द्र
कौन जाने उसके बिरहोड. टंडा में
बसंत आता था या नहीं,
अकाल-मृत्यु आ ही जाती अक्सर
कई-कई रूप धर कर
रणेन्द्र की कविताओं से गुजरना जैसे दुखमय जीवन की स्मृतियों से गुजरना है। दुख जो हमें सालता है बारहा, चालता है हमारे भविष्यत के स्वप्नों तक को। हतवाक् करती हैं ये कविताएं और हृदय की गहन अंधअंतःकारा के टिमकते दीपकों में जैसे स्नेहद्रव की कुछ बूंदें पडती हैं और एक लौ उमगती है नयी पत्ती सी कांपती। सुख के कई रंग होते हैं पर दुख का एक ही रंग होता है माटी सा, माटी से उठता ढूह सा, फिर माटी सा पसर जाता। दुख के मर्म को इस तरह अभिव्यक्त करने की यह दृष्टि ही है कवि की जो ऐश्वर्या राय के नौलखा परिधान पर बूधन बिरजिया की फटी हुई गमछी को तरजीह देती है। यह कवि के गहन दुखबोध से उपजी दृष्टि ही है जो कोयला खोदने व ढोनेवाले एक मजदूर को एक योद्धा की तरह चित्रित करती है- कभी नहीं मानेगा हार/हमारा वीर बहादुर/जनरल-मार्शल/बूधन जवान/जानता है/किसी दिन/खदान धंसान से/देगा वह बलिदान/न बिगुल/न तिरंगा/न कोई चक्र/न सम्मान।
रणेन्द्र की इन कविताओं में वह जीवन आया है जिसकी सिर्फ बात करते अघाते नहीं हैं कविगण और बात-बेबात जिसकी चर्चा करते थकते नहीं आलोचकगण । इसमें आदिवासियों का जामुनी रंग बडी ढिठाई से बांधता है दीठ को और सांवरी का सौंदर्य उद्वेलित करता है काली रात से कलंक को भी दिठौना सा धारने को।
ये कविताएं सलवा जुडुमः के दानवी नायकों की क्रूरता के प्रति आगाह करती हैं कि इन नव इदी अमीनों के फ्रिजरों का एक कोना भी नहीं भरा है/ताजे नरगोश्त से। थोडा सा स्त्री होना चाहता हूं शीर्षक है रणेन्द्र के कविता संग्रह का और यह थोडा सा स्त्री होना ही पूरा मनुष्य होना है और ये कविताएं पाठकों को इसी मनुष्य होने की ओर ले जाने की कशिश करती हैं।
रणेन्द्र का यह कविता संकलन शिल्पायन प्रकाशन , दिल्ली से आया है।
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2 comments:
आपसे निवेदन करता हूँ कि अगर हो सके इनकी और भी कविताएं प्रकाशित करियेगा ।
इतनी बेहतरीन प्रस्तावना के साथ कविता संग्रह के विवेचन से रणेंद्र की कविताओं को पढ़ने की ललक बढ़ गयी है...
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