कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

दिमाग के साथ दिल की सुनने की वकालत करता उपन्यास-बंधन

बंधन  मनोज सिंह का मनोरोगी के परिवार को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है। इसकी मुख्य पात्र निकिता अपनी पारिवारिक सामाजिक पृश्ठभूमि में मनोरोग का षिकार होती है। मनोरोग किस तरह पूरे परिवार और समाज की परेषानी का कारक हो सकता है और किस हद तक हमारा समाज और परिवार मनोरोगों के विकास में सहायक होता है इस द्वंद्व को यह उपन्यास मार्मिक ढंग से दिखला पाता है। कहीं कहीं अतिरिक्त विवरणात्मकता पाठकीयता को बाधित करती है पर आरंभ से अंत तक उपन्यास  में बहती भावधारा पाठक को आपने साथ बांधे रखने में समर्थ होती है।
एक चिकित्सक अमित के हर्ट अटैक से आरंभ होकर उपन्यास उसके गरीबी भरे दिनों में लौटता है और  उसकी मार्मिक गाथा को सामने लाता उसके युवा दिनों में जाता है जहां अपनी मेहनत और मेधा से पहुंचने के बाद उसकी मुलाकात अन्य मेडिकल छात्रा निकिता ,उसके दोस्त विक्रम आदि से होती है। समाज की सबसे निचली पंक्ति से आने के कारण अमित हर जगह खुद को बचाकर अपनी मिहनत से आगे बढता है वहीं दिल्ली के उच्च वर्ग से आए विक्रम ,निकिता आदि हर जगह अपना रौब गालिब करते रहते हैं। निकिता का सौंदर्य अलग से उसके घमंड को कायम रखने में अपनी भूमिका अदा करता रहता है। पर अपनी मेधा से अमित हमेषा पढाई में आगे रहता है और सबको उसकी मदद की जरूरत पडती है। निकिता को भी। जबकि विक्रम कहाने को तो निकिता का अजीज है पर वह कहीं से उसके विकास में सहयेागी नहीं हो पाता।
आगे उपन्यास में मोड तब आता है जब अबाध स्वतंत्रता और आनंद की धारा में बहती निकिता गर्भवती हो जाती है और विक्रम अपनी अन्य महिला मित्रों में रम जाता है और निकिता को काई सहारा देने से भागता है। ऐसे में अमित सामने आता है और निकिता का साथ देता है। आगे निकिता उसकी जीवन संगिनी बनती है। पर यहां से अमित के जीवन की त्रासदी का नया अध्याय आरंभ होता है। निकिता को प्यार में लगा झटका उसकी मानसिक विचलन का कारण बनता है और धीरे धीरे वह बाइपेालर मूड डिसार्डर का षिकार होती जाती है। घर में वह असामान्य व्यवहार कर सबको परेषान कर डालती है। अमित इसे उसके उच्च वर्गीय नखरे मान सहता जाता है पर इसका उसके पूरे परिवार पर नकारात्मक असर होता है। यहां एक बात जो नेाट करने लायक है वह यह कि एक ओर अमित का परिवार है जिसने आरंभ से बेइंतहा दिक्कतें झेलीं और उसी से निकल कर अमित एक समर्थ चिकित्सक बना और उसके अपने परिवार के लोग मनोरोग के षिकार उस तरह से नहीं हुए जिस तरह से हर तरह से समर्थ निकिता के परिवार में मनोरोगों का दबाव बढता गया। उसके पिता नींद की दवाएं लेते थे उसकी बहन भी आगे सिजोफ्रेनिया की षिकार हुयी। जब कि सामाजिक रूप से वे अपने आगे अमित को कुछ समझते नहीं थे। उपन्यास में एक जगह अमित की बचपन की संगिनी अदिति सोचती है-इतनी सुंदर निकिता और मानसिक रूप से पूर्णतः बीमार,यकीन नहीं होता। दूसरी ओर अमित,बचपन से ही बस लड़ रहा है,भोग रहा है दुख ही दुख।
उपन्यास दिखलाता है कि किस तरह परिस्थितियां आदमी को बेबस बना देती हैं और उसके सूत्र हमारे समाज में विद्यमान दिखते हैं। और इन परिस्थितियों को बदलने के लिए समाज की बनावट को भी बदलने की जरूरत है। क्योंकि अमित और  निकिता दोनों ही चिकित्सक हैं पर ना अमित समय पर निकिता को सही ईलाज उपलब्ध करा पाते हैं ना निकिता कहीं से अपने चिकित्सकीय ज्ञान का प्रयोग अपनी रक्षा में कर पाती है। उनका सारा ज्ञान और आर्थिक सामर्थ्य परिवेष की दुरभिसंधियों से मात खा जाता है। एक जगह उपन्यासकार कहता भी है - डॉक्टरी ज्ञान और मानवीय दुख दर्द का एहसास, दोनों में बहुत फर्क है।अमूमन डाक्टर भी एक रोगी जैसा ही व्यवहार करता है।
निकिता और अमित का मामला जब मनोचिकित्सक के पास जाता है तो वह भी उलझन में पड जाता है और निकिता की मानसिक गडबडियों की तह में जाना चाहता है- वह बोलता है- आजकल अधिकतर षषादियां असफल हैं। करण बहुत से हैं। एक तो आदमी  ओर उसके घरवाले वर्शों से औरतों पर अत्याचार करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। दूसरा,इन बातों को सुन सुनकर लड़कियां अधिक सतर्क और सावधान हो गई हैं।कई बार वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त भी होती हैं।
एक तथ्य यह भी सामने आता है कि अमित और निकिता के उलट सारी गडबडियों का कारक विक्रम अपनी जिंदगी मजे में गुजारता चला जाता है। यहां यह दिखता है कि भावनात्मक रूप से संवेदनषील व्यक्ति को वर्तमान परिवेष में बहुत ज्यादा झेलना पडता है। जबकि विक्रम की उज्जडता उसे उसकी दबंगई के साथ बचाए रखती है। यह परिवेष गत गडबडी है।
उपन्यास समाज के मनोविज्ञान को भी एक हद तक सामने लाता है। कि जबलपुर के दर्जन भर गरीब लोगों के दर्जनी मुहल्ले के तमाम संकटों को झेल कर वहीं से दो अच्छे चिकित्सक सामने आते हैं। और ये दोनों चिकित्सक उन अभिभावकों के साये में पल बढ कर सामने आते हैं जिन्हें समाज नीची निगाह से देखता है। और समाज के निचले स्तर पर भाईचारे की भावना जिसतरह रहती है वहीं उन्हें बचाती है और आगे बढाती है जबकि उपर के स्तर पर हर तरह से समर्थ निकिता और विक्रम के परिवार वाले विरासत में मानसिक बीमारियां ही दे पाते हैं।
उपन्यास दिमाग के साथ दिल की सुनने की भी वकालत करता है। वह चाहता है कि लोग केवल अपनी भावनाओं की ही कद्र ना करें बल्कि दूसरे की भावनाओं को भी समझें - भावना दिखाने के बहुत सारे तरीके होते हैं, जो प्रकृति ने हर जीवित प्राणी को दे रखे हैं। मुष्किल सिर्फ इस बात की है कि सामने वाला उन भावनाओं को कितना समझ पाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उस भावना को पढ पा रहे हैं कि नहीं पढ पा रहे हैं। इससे भी अहम बात है कि आप उसे पढना चाहते हैं या नहीं।...कि जो आदमी ज्यादा समझदार और संवेदनषील होता है, वह हर चीज को दूसरे के पहलू में भी रखकर सोचता है।

1 टिप्पणी:

लवली कुमारी ने कहा…

पेग्विन से एक आत्मकथा आई थी हिंदी में...किसी मरीज की....नाम था "स्किज्रोफ्रेनिया"..पढिएगा..मुझे अच्छी लगी.