कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

व्यवस्था के प्रश्न उठाती कविता : कुमार कुमुल


'पानी का दुखड़ा' युवा कवि विमल कुमार का तीसरा कविता संकलन है। इस लगातार असंवेदनशील होते समाज में आदमी का दुख आज उपेक्षा की वस्तु बनता जा रहा है। पर दुख तो दुख है उसकी चिल्हकन छिपाए छिपती नहीं। बाजार की अमानवीय चमक के विरु( दुखों की यह चिल्हकन अकेले पड़ते आदमी की लड़ाई की संक्षिप्त अभिव्यक्ति है। ये कविताएँ उसी दुख की अभिव्यक्ति हैं। यह पानी का नहीं आम आदमी का दुखड़ा है-''कि अब तक सबसे ज्यादा भरोसा रहा/मनुष्य का सूर्य पर/पर सबकुछ इसी तरह चलता रहा तो धूप भी डरावनी हो सकती है।'' धूप डरावनी हो चुकी है। पर्यावरणीय असंतुलन ने धूप की जगह अल्ट्रावायलेट किरणों के लिए स्पेस बढ़ाना शुरू कर दिया है और यह आदमी का वैश्विक दुखड़ा है-
''वे इतने उद्यमशील हैं
कि संवेदनहीन है
वे इतने सभ्य हैं
कि हत्यारे हैं।''
पत्राकारिता के पेशे में रहने के कारण विमल सत्ता और समाज के उस संतुलन बिंदु पर काम करते हैं जहाँ समाज के दुख की चिल्हकन सत्ता के सुखों के राग को हमेशा चुनौती देती रहती है। विमल की सबसे अच्छी व प्रभावी कविताएँ वहीं पैदा होती हैं, वहाँ विमल समाज की इस चिल्हकन को समझने और उसके पक्ष में आवाज उठाने से कभी पीछे नहीं हटते। 'प्रिय संपादकजी,' 'व्यवस्था का प्रश्न', 'संसदीय गरिमा', 'नाम', 'परिवर्तन', 'रोने का विज्ञापन', 'खुशी' आदि ऐसी ही कविताएँ हैं जिनमें आम आदमी का दुख व्यवस्था के प्रश्न के नीचे दम तोड़ता रहता है। व्यवस्था का प्रश्न सत्ता का सनातन डंडा है जो आम आदमी की जुबान जाबे रहता है-
''देश में सारे सवाल
स्थगित कर दिए गए हैं
क्योंकि संसद में अभी
व्यवस्था का प्रश्न है।''
''प्रिय संपादक जी'' संग्रह की सबसे प्रभावी कविता है जिसमें कवि मीडिया के जनविरोधी चेहरे को बेनकाब करता है-
''प्रिय संपादक जी
सब कुछ छापिएगा
मगर सूखे की खबर मत छापिएगा
अगर छापिएगा...
तो यह मत लिखिएगा
सूखे के कारण भुखमरी है
कि भुखमरी के कारण लोग मर रहे हैं''
इस तरह जनता का दुखड़ा विमल कुमार की कविताओं में बारहा अभिव्यक्त होता है, पर वह दुखड़ा ही रह जाता है सत्ता के मुकाबिल वह एक ठोस चुनौती की शक्ल नहीं ले पाता है। इसका कारण संभवतया कवि का पेशा है जो उसे इस दुख को पचाकर उसे प्रतिकार के औ८ाार में बदलने का मौका ही नहीं देता। अपने वैश्विक दुखों से त्रास्त इस समाज में विमल की कविताएँ ढाढस या आश्वासन की तरह हैं। पर इससे आगे जाकर वे परिवर्तन का औ८ाार बनें इसके लिए जरूरी है कि अपने सृजनकर्म को ठोस रूप देने के लिए वे स्पेस पैदा करें। दुखों को तुरंत अभिव्यक्त करने की हड़बड़ी से बचें वे। कवि की हड़बड़ी ठोस रूप में भी दिखती है। वह इस बात का ध्यान तक नहीं रख पाता कि कहाँ क्या लिख रहा, अपना संकलन वह ठीक से देख तक नहीं पाता। नतीजा कई जगह बातें दुहराता चलता है वह। 'मुखौटा' और 'चार कविताएँ' में एक पूरे पैरे को वह करीब-करीब ज्यों-का-त्यों लिख डालता है-
''पिफर हुआ
किसी का कत्ल
पिफर सुनाई पड़ी
किसी की चीख...
लगता है, पिफर लौट आया है
हत्यारा
अपने चेहरे पर
समय की नकाब ओढ़कर।''
''चार कविताएँ'' कविता की ये पंक्तियाँ 'मुखौटा' कविता में ज्यों की त्यों हैं बस अंत में 'हत्यारे' की जगह 'समय' शब्द है और 'नकाब' की जगह 'मुखौटा'। कवि का तीसरा संकलन है यह और अब तक उसे शब्दों की पिफजूलखर्ची पर ध्यान देना आ जाना चाहिए था। उपरोक्त पैरे में ही कवि लिख सकता था-''पिफर लौटा है समय लगाकर मुखौटा।'' मुखौटा 'अपने चेहरे पर' ही लगाया जाता है। यह और ऐसी बातें लिखना शाब्दिक अपव्यय को ही दर्शाता है, बशर्ते कि वह कवि की कोई शैली न हो या रेटारिक का प्रयोग न हो वह।

कवि के जीवन दर्शन और नये विचारों द्वारा उसमें पैदा की जा रही खलल को भी कवि साध नहीं पाता शब्दों में। इससे कई बार जब वह कोई कथा रचता एक दर्शन अभिव्यक्त करना चाहता है अंतिम वक्तव्य एक जुमले में बदलकर रह जाता है जो चौंकाता भर है-जैसे अंत में यह कहकर चलते बनना कि-''हमें मालूम है आप किनकी आँखों में चमक देखने आए हैं।'' यहाँ नमक की तुक चमक से मिल एक चमक पैदा करती है पर कविता अपने पूरेपन में बिखरी सी है। इसी तरह 'मुखौटा', 'नर्तकी' आदि अपेक्षाकृत लंबी कविताओं में कवि का जीवन दर्शन जहाँ-तहाँ सूक्ति की तरह टंका लगता है, एक मुकम्मल कथा कवि रच नहीं पाता। अलबलाकर कवि कहीं भी, कुछ भी लिख डालता है। 'सर्वानुमति', 'सिलसिला' जैसी सतही कमेंटनुमा पंक्तियों को एक संग्रह में संकलित करने का कोई कारण नहीं दिखता। आगे से कवि को किसी संपादक का सहयोग लेना चाहिए ताकि समय जाया करने वाली पंक्तियों व पैरों से वह पाठक को निजात दिला सके।
कुल मिलाकर कवि की ताकत यही है कि व्यवस्था के प्रश्न के मुकाबिल कवि अपनी उलझनों को कुछ ठोस सवालों की शक्ल दे पाता है और उसे आगे इसी पर ध्यान देना चाहिए। विचारक और दार्शनिक होने की जिद में जिस तरह वह अपने कवि को बेवजह दबावों में डालता है वह आगे उसके लिए परेशानी का कारक ही बनेगा, विचार अंतरधारा की तरह बहें वही बेहतर है, उजबुजाकर प्रकट होने की बजाय।

पाखी दिसंबर अंक से

1 टिप्पणी:

सागर ने कहा…

यह ब्लॉग मुझे पसंद है... आप जारी रहें यूँ ही... मैं पढता हूँ.. प्रस्तुत प्रसंग भी पसंद आया... इस ब्लॉग की आने वाले दिनों में लोकप्रियता बढ़ने वाली है.