कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

क्‍य वो जानती है सावन खत्‍म हो चुका - कविता - नवीन कुमार


बादल घिरता है बरसात का अंदेशा है
कि हवा आ-आ उन्‍हें खोल-खोल देती है
बादल उडता-उडता-सा है

इधर मैं देखता हूं और
मुझको बार-बार लग रहा
मैं नहीं पहचान पा रहा हूं यह लडकी...
इतनी सुंदर
जितनी खुश दिख रही
उतनी कभी होती नहीं
लाखों लोगों का छुपा दर्द न जाने किस समुद्र में
विलीन हो रहा।

ज‍बकि मैंने बहुत-बहुत बातें कीं हैं उससे
और कराची तक में हो रही मौतों पर
उसे रोते देखा है तो गुस्‍से से भरपूर

और, वो लडकी
इतनी हल्‍की...इतनी खफीफ
कि मोटरसाइकिल अपने रौ ,में हुई तो
हवा में पीछे ढकेलती झूलती-सी
जैसे कि झूला...
हथेली से दांतों को छिपा,अपने को अपने से छिपा
हंसती
पता नहीं ये चालक कौन है
क्‍या वो जानती है सावन खत्‍म हो चुका...

1 टिप्पणी:

Rajey Sha ने कहा…

वाकई वो ये भी नहीं जानती कि‍ सावन कब शुरू हुआ था।

खूबसूरत भावयुक्‍त कवि‍ता।