मंगलवार, 5 जनवरी 2010

नया साल, ठंड और लोदी गार्डन - डायरी

धर्मेंद श्रीवास्‍तव


तीन की सुबह जगा तो जनवरी की ठंड जैसी होती है वैसी थी, और हमेशा की तरह ठंड मुझे अपने बिल से निकलने को बाध्‍य करती है सो अपने कमरे से निकला तो लगा कि मौसम ऐसा है कि बिना चले गर्मी आएगी नहीं, तभी अपने कवि मित्र पंकज पराशर की याद आयी जिनका फोन अक्‍सर आता रहा कि कहां हैं भाई साहब , जब से नजदीक आए हैं नजर नहीं आते सो तय किया कि यह दो किलोमीटर का मंगलम से पांडव नगर का फासला चलकर तय किया जाए तो गर्मी आ जाएगी।
हल्‍की हवा और कुछ कुहरीला मौसम चलने में आनंद दे रहा था तभी मैथिली कवि महाप्रकाश की याद आयी जिनके मैसेज का जवाब नहीं दिया था अब तक, चार दिन हो गये थे, सो फोन लगाया और बताया कि परेशान तो डेढ दो साल से हूं या ताउम्र परेशान ही रहा हूं और रहना है - मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्‍यों...। उन्‍होंने कुछ सलाह दी कि अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर दिया करो उन्‍हें रोको नहीं इस तरह। उन्‍हें कैसे बताता कि वे इतने अपने हैं कि उनसे क्‍या व्‍यक्‍त करूं खुद से ही खुद को कैसे व्‍यक्‍त करे कोई।
आगे बढा तो दो लडकियां एक रिक्‍शेवाले से जूझ रही थीं - सडक पार करती वे चीख रही थीं - बीस की जगह तू पचास रख ले , तुझे भीख चाहिए ना ... वही सही। ऐसा कहती वे पास के एक होटल में घुसते हुए रिक्‍शेवाले को देखे जा रही थीं कि उसकी सदाशयता कब प्रकट होती है...। मैं भी मुड कर देख रहा था कि क्‍या करता है रिक्‍शेवाला। तो उसने धीरे से रिक्‍शा बगल की गली में लुढका दिया। शायद सामने सडक पर जाते जाना उसे सहन ना हो रहा हो नैतिकता के लिहाज से। मैंने सोचा अच्‍छा है, कि लडकियों का इस तरह का गुस्‍सा अच्‍छा है और रिक्‍शेवाले का इस तरह आंखें चुरालेना ,इसका विकल्‍प कहां उसके पास...।
पंकज के पास पहुंचा तो उनका बेटा दरवाजे पर ही खेलता मिला , अपनी बडी बडी आंखों से देखे जा रहा था वह...। उससे संवाद की कोशिश करता भीतर दाखिल हुआ मैं वहां पंकज की मोहतरमा सामने रसोई में लगीं थी काम धाम में...। पंकज ने बताया कि उनका एक कविता संकलन आया है मैथिली में, देखा तो उसमें संगीत की शब्‍दावली व रागों से संबंधित कई कविताएं थीं । फिर उन्‍होंने अखबार की नौकरी और समय की किल्‍लत की बातें कीं, हालांकि इस बीच भी वे दिल्‍ली की संगीत की म‍हफिलों में जाने का समय निकाल लेते हें।
हम बात में लगे थे तब तक गोभी के पराठे आ गये गर्म गर्म, टमाटर की चटनी के साथ। खाने वाले हम तीन जने थे एक बच्‍चे के नाना जी, सो मोहतरमा को तेजी से हाथ चलाना पड रहा था। इसतरह जोड के लिहाज से अच्‍छी और मनपसंद खुराक मिल चुकी थी तो निकल पडा लोदी रोड की तरफ , वहां विनोद जी के यहां से मनोवेद के नये अंक भी लेने थे। अंक लेते धर्मेंद्र श्रीवास्‍तव से बात हुयी तो बोले - अरे आइए...।
तीन बजे तक पहुंचा वहां। उस अंक में धर्मेंद्र जी का भी एक लेख था माइकल जैक्‍सन पर । उसे देख उनकी मोहतरमा खुश हुयीं कि चलिए आप इनसे कुछ काम करा ले रहे हैं नहीं तो ये तो सुबह से बिछावन से निकले ही नहीं हैं..। फिर धर्मेंद ने अपनी ड्राफ्ट की कुछ नयी क‍हानियां सुनाईं। आत्‍मीय संबंधों और उनके अंतरविरोधों पर अच्‍छी कहानियां लगीं वे। मैंने कहा उन्‍हें फाइनल कीजिए..। फिर हमलोगों ने खाना खाया। काव्‍या ने पूछा - चाय बनाउं अंकल। हमलोगों ने कहा- जरूर जरूर ...। फिर धर्मेंद्र बाहर निकले और बोले अरे मौसम कितना अच्‍छा है,ठंड है, बदली है , इसमें बारिश हो जाए तो घूमने में मजा आए। ऐसा कहते वे आसाम की बारिश और हरियाली को याद कर रहे थे। फौजियों के लिए मौसम के मानी अलग होते हैं। सो उन्‍होंने लोदी गार्डन जाने की तय की।
छाता, टोपी आदि डटा कर हम निकले, आटो लिया और पांच बजे तक गार्डन गार्डन। गेट पर ही बडे बेचने वाले को देख धर्मेंद्र ने दो प्‍लेट बडे लिये। मैंने सोचा, अब किस पेट में खाया जाएगा ...। अब तक रूकी बदली जैसे हमारे ही इंतजार में थी। और छाते को भी चल निकलने की मोहलत मिल गयी। जहां तहां इक्‍का दुक्‍का लोग बारिश से लौटने लगे थे। कुछ ही देर में बारिश थम गयी। पास के मैदान में कुछ युवक युवतियां डिस्‍क उछालने के खेल में लगे थे। आगे बढे तो छोटा सा कृत्रिम नाला था जिसमें बत्‍तखें तैर रही थीं छोटी व बडी हंस नुमा सफेद बत्‍तखें कुछ कत्‍थई और काली भी। पानी में हमलोगों ने बडे के टुकडे गिराये तो छोटी मछलियों का झुट वहां आ जुटा।
तब हमें अपना मोबाइल कैमरा याद आया। और रिकार्डिंग शुरू कर दी हमने। जल, थल, गगन, चीलें, पेड, जलावन जमा करती स्त्रियां, जोडे, बूढे, जवान सबको कैद करते गए। बीच बीच में धर्मेंद गाने गाते लगातार रिकार्डिंग किए जा रहे थे। ...सारी धमाचौकडी के बाद हम निकले तो गेट पर आइसक्रीम वाले दिखे। तो धर्मेंद्र कहां रूकने वाले थे, पूछे क्‍या लिया जाए- मैंने कहा - मैं नही जानता बहुत ... और इस जाडे में। फिर रिप्‍पल्‍स खाते उन्‍होंने बताया कि इसका मानी लहरें होता है ... हम हंसे .. शीत की लहरें। आगे मौसम विभाग की छत के उपर चीलें मुआयना कर रही थीं तो रूक कर देखा हमने। फिर हम इंडिया हैवीटेट में जा घुसे वहां प्रवीण मिश्र की पेंटिंग प्रदर्शनी लगी थी। प्रवीण गुजरात अहमदाबाद से आए थे वहां। लाजवाब तस्‍वीरें थीं उनकी बनायी। गांधी, बाजार, हल्‍के नीले अंधेरे न्‍यूड्स,कांटेदार फेंस पर तितली..घोंघे।
वापिस पहुंचे तो मोहरमा ने कहा खाकर जाइएगा। मैंने कहा - इतनी जल्‍दी, अभी चार ही घंटे हुए हैं खाए, अब आज खाना मश्किल है मेरे लिए...।

1 टिप्पणी:

Pankaj Parashar ने कहा…

डायरी की विधा संबंधों की उष्मा से ओत-प्रोत है. कवि केदारनाथ सिंह की उसकी काव्य-पंक्ति की तरह- उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए मैंने सोचा...दुनिया को हाथ की गर्म और मुलायम होना चाहिए। शुक्र है चचा ग़ालिब की तरह आपको फुरसत के रात-दिन मिल जाते हैं, दिल को यह ढूंढना नहीं पडता। मेरा ख्याल है कि यदि आप डायरी लिखें तो अपने समय का ऐसा दस्तावेज साबित होगा जो एक लेखक की आंख में खचित दूसरे लेखक की छवि का सशक्त अंकन साबित होगा। राइनेर मारिया रिल्के की कविता कुछ पंक्तियां पेश कर रहा हूं-
How can I keep my soul in me, so that
it doesn't touch your soul? How can I raise
it high enough, past you, to other things?
I would like to shelter it, among remote
lost objects, in some dark and silent place
that doesn't resonate when your depths resound.
Yet everything that touches us, me and you,
takes us together like a violin's bow,
which draws *one* voice out of two separate strings.
Upon what instrument are we two spanned?
And what musician holds us in his hand?
Oh sweetest song.