कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 4 जनवरी 2010

लोदी गार्डन से कुछ तस्‍वीरें

कल शाम मेरे एक मूडी मित्र को ख्‍याल आया कि मौसम अच्‍छा है और लोदी गार्डन चला जाए। मैं चौंका कि यार बारिश हो रही है और इतनी ठंड है ... पर वह कहां मानने वाला ... आखिर छाता ले टोपी आदि लगा हम चल पडे...गेट पर पहुंचते ही बारिश होने लगी ... खैर हम बढते गए...फिर बारिश थमी और हम इधर उधर घूमने लगे ...मित्र के पास जो मोबाइल थी वह विडियों रिकार्डिंग के लिए अच्‍छी थी सो शुरू कर दी रिकाडिंग ... पेड,बत्‍तखें,आते जाते जोडे,बूढे ,जवान उन्‍हें हम कैद करते गए ...तो वह नजारा आप भी देखें...









4 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

का बात है मुकुल बाबू ठंडा बरसात में लोदी गार्डेन , फ़ोटू शोटू , कमाल है बहुत बढिया , अब तनिक कैमरवा आ कि मोबाईल संभाला जाए और ७ फ़रवरी को दर्शन दिया जाए ब्लोग बैठकी में । जगह और समय हम पहुंचा देंगे आपके पास । हमरा नं तो होईबे करेगा ...नहीं तो भी कोई बात नहीं हम खोज लेंगे आपको अपने , लौट के पकौडा खाए कि नहीं , महाराज ठंडा के लिए जरूरी होता है जी

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

कुमार मुकुल जी
आप दिल्‍ली में हैं
और वो भी दक्षिण में
तो हमें भी बतलाया करें
हम भी चले आयेंगे
तस्‍वीरें खिंचवाने
चाहे धुंध हो
चाहे हो बारिश
हो भीषण शीत
पर सबसे बड़ी जीत
मानव मन की प्रीत।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

जो लोदी गार्डन मैने देखा उस्की फोटो नही है.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

@ धीरू सिंह

गार्डन गार्डन नहीं
नजर नजर का फेर है
यह एक ऐसा हेर है
हर कोण से
बदल बदल जाता है।