गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

तुम्हारे हृदय का ये कोना भविष्य से भी उज्जवल हो सकता है

हील द वर्ल्‍ड - माइकल जैक्‍सन - धर्मेन्द्र श्रीवास्तव
जिजीविषा से लबरेज नाचते गाते मसीहा माईकल जैक्सन का जीवन जीते जी किंवदंती बनने के शिखर को छूने के साथ विवादों से भी घिरा रहा था। गीतलिखने के साथ ‘मून वाक’ जैसे अद्भुत एवं अद्वितीय डांस स्टेप्स को रचने में माहिर इस ब्रेक डांसर ने लाकिंग एवं पापिंग की अद्भुत कड़ियां रचीं।जिस जादुई सहजता के साथ वो डांस करता था उसी सहजता के साथ उसकी आवाज
अन्तरमन की गहराइयों में इस तरह उतरती है कि सुनने वाला उसके प्रवाह में बह जाता है। उसकी आवाज ऐसी जान पड़ती है जैसे अंतरिक्ष से फुसफुसाकर कोई प्रणय निवेदन कर रहा हो। ऐसे बहुत से तथ्य हैं जो माईकल जैक्सन के जीवन को जुदा रंग देते हैं। यही वजह है कि उसकी मौत ने पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को हिलाकर रख दिया।
माईकल जैक्सन का जीवन उपलब्धियों से भरा होने के बावजूद बहुत ऊबड़-खाबड़ रहा। उससे गुजरते असहजता से भर जाना एक सहज है। अपनी रचनात्मकता की कीमत उसने मरते वक्त तक चुकाई। बचपन में पिता की रिहर्सल और रेकार्डिंग की
अनुशासनात्मक सख़्ती उसे हरदम सालती रहती थी। जिस उम्र में बच्चे पार्क में खेला कूदा करते हैं वो या तो रिहर्सल कर रहा होता था या फिर रेकार्डिंग स्टूडियों से बच्चों को खेलते हुए निहारा करता था। बचपन की उन उमंगों को नहीं जी पाने का दर्द उसे ताउम्र सालता रहा। यह सब बताते एक इंटरव्यू के दौरान वो रो पड़ा था। बचपन में पिता के हंटर और हिकारत भरी
टिप्पणियों ने एक ऐसी कसक उसमें भर दी जिससे वह कभी पीछा नहीं छुड़ा पाया।अपने रंग से निजात पाने की उसकी चाहत विटिलिगो (एक चर्म रोग) के कारण ही नहीं थी, बल्कि कहीं न कहीं अपने पिता द्वारा बद्सूरत कहे जाने का दर्द
भी उसे सताता रहा होगा। उसकी नाक को लेकर भी उसके पिता उसका माजक उड़ाया करते थे। उस अपमान की पीड़ा ने उसे अपनी नाक की बार-बार सर्जरी कराने कोबाध्य किया था। अंततः उसकी नाक एकदम बेढंगी और बडौल हो गई थी। पिता के
व्यवहार ने उस पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। जिसको उसने बाद में खुलकर स्वीकार भी किया था। उसके एक अंकल ने बताया था कि वो अपनी उम्र से ज्यादा उदास दिखता है। उसकी इस उदासी का कारण शायद ही उसके आसपास का कोई व्यक्ति समझ
पाया हो। बचपन को नहीं जी पाने की कसक ने उसे छोटी उम्र में ही उदास कर दिया था। लेकिन अपनी रचनात्मकता की वजह से वो उस बिखराव से बच पाया जो आदमी को अंततः रूखा और खडूंस बना देती है।
माईकल अजीवन किशोर वय की मानसिकता में अटका रहा। (उसके कपड़े, हाव-भाव, स्त्रियोचित आवाज जिसे कायम रखने के लिए वो काफी मेहनत करता था।) इस बात की तरफ इषारा करते हैं। माइकल स्टीवेन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘पीटर पैन’ में काम करना चाहता था। पीटर पैन नेवरलैंड का वो बालक था जो कि बड़ा होने से इनकार कर देता है। पीटर पैन के साथ माईकल इस गहराई से तादात्मय बिठा चुका था कि उसने अपने रैंच का नाम ही ‘वंडर लैंड’ रख दिया । वह स्वयं को पीटर पैन का ही प्रतिरूप समझता था। अपनी उम्र को वह वहीं रोककर जीना चाहता था। जिस उम्र में उसके बड़े भाई संगीत की दुनिया का सितारा बनने की सोच रहे थे वो एक सितारा बन चुका था।
म्यूजिक इंडस्ट्री को लेकर भी उसके अनुभव अच्छे नहीं रहे। म्यूजिक इंडस्ट्री ने उसे बहुत कुछ दिया लेकिन उस दुनिया की व्यवसायिक खींचतान उसे हरदम परेशान करती रही। अपनी आदिम तंगी से निपटने के लिए ही उसने लंदन में शो आयोजित करने के विचार को स्वीकार किया था। जैसा कि उसकी बेटी ने कहा था- ज्यादा काम करने की वजह से ही उसकी मौत हुई। आखिर क्यों उसे इतने पेनकिलर की जरूरत पड़ती थी। दवाइयों की ओवरडोज ही उसकी मौत का कारण बनी।
म्यूजिक इंडस्ट्री के काम का ही दवाब था कि वो परफार्म करने के लिए अधिक से अधिक दवाइयां लेने लगा। और बकौल दीपक चोपड़ा, ड्रग माफिया माइकल जैसे मशहूर लोगों को अपनी गिरफ्त में ले अपनी तमाम चालबाजियों को अंजाम देते
रहे। म्यूजिक इंडस्ट्री की कठोर सच्चाइयों से रू-ब-रू होने के कारण माईकल ने ब्रिटनी स्पीयर्स को म्यूजिक इंडस्ट्री छोड़ देने की सलाह दी थी। व्यवसायिकता अच्छे-अच्छे कलाकारों को अपने दलदल में फंसा लेती है। माइकल भी इस से बच नहीं सका। गुरूदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के अंत में नायक जिस तरह एक गुमनाम जिंदगी जीने चला जाता है, उसे समझकर हम संवेदनशील कलाकारों के जीवन की विडम्बना एवं व्यथा को समझ सकते हैं। मइकल ने जिन ऊंचाइयों को अपने जीवनकाल में छुआ था वहां पहुंचने के बाद आदमी अक्सर अकेला हो जाता है। और अकेलापन एक सहृदय साथी एवं माहौल की कमी
से बढ़ता चला जाता है। रचनात्मक ऊर्जा से भरे संवेदनशील व्यक्ति का अकेलापन भयावह होता है। संवेदनशीलता के षिखर पर बैठा आदमी बिखराव का शिकार होता जाता है। बड़े कलाकारों के अंदर एक आत्महंता प्रवृत्ति देखी गई है जो कि उनकी व्यथा एवं जिद का मिश्रित रूप होती है। वानगाग, निराला, गुरूदत्त, मुक्तिबोध इसके उदाहरण हैं।
अकेलेपन और शारीरिक परेशानियों से निजात पाने के लिए उसने दवाइयों का सहारा नियमित रूप से लेना षुरू कर दिया था। 1997 के अपने गीत मार्फिन में उसने डेमेरोल नाम की दवा का जिक्र किया है। दीपक चोपड़ा (आध्यात्मिक चिंतक एवं लेखक) माईकल जैक्सन के करीबी लोगों में से थे और जिन्होंने दवाओं के आदी होते माईकल जैक्सन की पीड़ा को रेखांकित
किया है। माईकल जैक्सन जैसे लोगों की समस्या इतनी आसान नहीं होती कि दवाएं या बाजारू आध्यात्म उसे दूर कर सके एक सहृदय एवं सच्चे कलाकार को जिस दुनिया की तलाश रहती है, यथार्थवादी दृष्टि से देखा जाए तो जीने लायक
दुनिया वही है। रोजमर्रा के जिस जीवन से हम रू-ब-रू होते हैं उसे किसी तरह वक्त गुजार देने की उबाऊ आवृति/प्रवृति ही कहा जा सकता है। माईकल जैक्सन जैसे अभूतपूर्व प्रतिभा संपन्न कलाकार का तादात्मय कभी भी अपनी स्थितियों से नहीं हो पाया और वो गा पड़ा ‘डोंट स्टाप टिल यू गेट इनफ’ अपने एक इंटरव्यू में माईकल कहता है कि ‘दुनिया एक बहुत बड़े आर्केस्ट्रा की तरह है। अस्तित्व अपने षुरूआती दौर में नाद की तरह रहा होगा और वो भी संगीत से परिपूर्ण। श्‍ब्दब्रह्म की भारतीय व्याख्या के कितने नजदीक है पश्चिमी संगीत के शिखर पर बैठे इस नाचते गाते मसीहा के आत्मा की आवाज।
29 अगस्त 1958 में जन्मे माईकल पिता जो एवं याता कैथरीन की नौ संतानों में सातवीं थे। उनके पिता गिटार बजाते थे और मां गाईका थी। मार लोन, जैकी, तीरो, जरमैन और मईकल ने 1966 में ‘जैक्सन फाईव’ नाम का गुप बनाया
और 1968 में माताउन रेकार्डस के लिए गीत रेकार्ड किए। ‘जैक्सन फाईव’ के पहले ही एलबम के गीत आई वांट यू बैक ने पहले नम्बर पर पहंचने में सफलता पाई।
‘आई वांट यू बैक’ के बाद ए बी सी’ द लव यू सेव और आई विल बी देयर भी बिलबोर्ड चार्ट में पहले नंबर पर रहे। यह एक जबरदस्त उपलब्धि थी। गाट टू बी देयर माईकल जैक्सन का पहला अकेले गाया गया वो गीत था जो चैथे स्थान पर पहुंचा था। ‘बेन’ नामक गीत माईकल का पहला अकेले गाया वो गीत था जो नंबर एक पर पहुंचा था। माईकल को पहला ग्रामी पुरस्कार ‘डोंट स्टोप टिल यू गेट इनफ’ के लिए मिला था।
1982 में माईकल का थ्रीलर नाम का एलबम आया जिसने उसे एलविस प्रेसले आदि महान गायकों की श्रेणी में ला खड़ा किया। इस एलबम की 104 मिलियन कापियां बिकी थीं। गीनिज बुक आफ वल्र्ड रेकार्डस में सबसे ज्यादा बिकने वाले एलबम का रिकार्ड थ्रीलर ने दर्ज कराया। माइकिल को आठ ग्रामी अवार्डस मिले। बाद में बैड डेंजरस हिस्ट्री-पास्ट, प्रेजेन्ट एंड फ्यूचर तथा आखिरी एलबम इनविंसिबल आए।
माईकल के गीतों की एक लम्बी फेहरिस्त है जो कि लोगो के बीच में अत्यधिक लोकप्रिय थे ‘बिलीजीन’, ‘बैंड’, थ्रिलर, ब्लैक ऐंड वाईट, हील द वल्र्ड, द वे यू मेक मी फील, आई जस्ट कांट स्टाप लविंग यू, विल यू बी देयर, डोंट स्टाप टिल यू गेट इनफ, बीट ईट डेंजरस, यू आर नाट एलोन, अर्थ सांग, यू राक माई वलर्ड, आफ द वाल, मैन इन द मिरर, ब्रेक आफ डान, ब्लड आन द डांस फ्लोर, वन्ना बी स्टटिइन समथिंग, यू आर नाट एलोन। माईकल के गाए गीतों की रेंज बहुत बड़ी है। ब्रेक डांस के लिए माकूल गीतों को वह जितने प्रभावी रूप में पेष करता था उसी सफलता के साथ ‘हील द वल्र्ड’ ‘यू आर नाट एलोन’ जैसे मधुर गीत भी वो प्रस्तुत करता था। हील द वल्र्ड गीत उसने खुद रचा और प्रेम की जरूरत एवं मांग को उसने जिस साफगोई से लिखा उतनी ही मर्मस्पर्शी एवं मधुर आवाज में गाया भी। अर्थ सांग ने दुनिया भर में पर्यावरण के तहस-नहस होने की ओर हमारा ध्यान खींचा। बीट इट में उसने नशे के खिलाफ लोगों को जागृत किया। डोंट स्टोप
टिल यू गेट इनफ में भी एक जबरदस्त उत्साहवर्धन है। अद्भुत है कि कहीं भीये गीत उबाउ और निष्प्राण नहीं हैं जैसा कि सामाजिक मुद्दों से जुड़ गीतों में अक्सर हो जाता है।
माईकल के प्रेम गीत व मस्ती भरे गीतों की बात भी निराली है। रहस्यवाद में विश्‍वास नहीं होने के बावजूद वो थ्रीलर रचता है।उसके संगीत को ए आर रहमान से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति तक पसंद करते हैं। 1984 में माईकल को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से बीट इट, गीत के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। बचपन से ही उसे संगीत की बेहतर समझ थी। क्लासिक संगीत को सुनने के साथ-साथ वो उन पर तुलनात्मक रूप से बातें भी करता था। अपने भाइयों के साथ
गाए गीतों में से उसे बहुत कम गीत तथा उनकी धुनें पसंद थी। वो इस बात को खोजता रहता था कि वो कौन से तत्व हैं जो संगीत को षाष्वत एवं लोकप्रिय बनाते हैं। इसके लिए वो संगीत की एनाटमी को समझने के प्रयास में लगा रहता था। गीत-संगीत के लिए एनाटमी शब्द का प्रयोग वो अक्सर किया करता था। माईकल का जीवन विवादों से भरा रहा कभी उस पर समलैंगिक होने के आरोप लगे तो कभी बाल-यौन षोषण के। हालांकि कोई भी इलजाम साबित नहीं हो पाया। मार्टिन बशीर की डाक्यूमेंट्री लिविंग विथ माइकल जैक्सन में माईकल ने स्वीकार किया था कि वो अपना बेडरूम बच्चों के साथ शेयर करता है। लेकिन साथ उसने यह भी कहा कि वो उन्हें कुकिज खाने को देता है। यौन संबंधों का कोई मामला नहीं है। माईकल बच्चों से बेहद लगाव रखता था और शायद इसी को फायदे के लिए विकृत रूप देने की कोशिश की कुछ लोगों ने। उस पर समलैंगिक होने का इलजाम भी लगा। इसी वजह से उसने ‘ए कोरस लाईन’ नाम की फिल्म में काम करने से मना कर दिया। क्योंकि यह समलैंगिकों पर थी। उसकी आवाज भी एक कारण थी उस पर समलैंगिक हाने का शक करने का। माईकल अपने माता-पिता तथा भाइयों को ज्यादा पसंद नहीं करता था। उसकी नजर में वो सुस्त तथा लालची थे।
माईकल के जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को देखते हुए रूसो याद आते हैं, अपने आप्त-वाक्य के साथ- जहां पर वो आजाद पैदा हुए लोगों की जंजारों की बात करते हैं। माईकल की व्यथाएं एवं विडम्बनाएं मात्र माईकल की ही नहीं थीं। वो विडम्बनाएं और व्यथाएं हमारी आपकी भी हैं। जब इतने प्रतिभाशाली एवं रचनात्मक व्यक्ति के साथ इस तरह की कड़वी सच्चाइयां अपनी कुटिलता के सा विद्यमान रहती हैं तो बाकी लोगों का हश्र कुछ अलग नहीं हो सकता। यही वजह था कि अपनी संवेदनशीलता की करुण पुकार के साथ माईकल जाते-जाते कह गया
हील द वर्ल्‍ड
तुम्हारे हृदय में एक जगह है
और मुझे पता है वहां प्यार है
तुम्हारे हृदय का ये कोना
भविष्य से भी उज्जवल हो सकता है
अगर तुम कोशिश करो
तो पाओगे निराष होने की कोई जरुरत नहीं है
दिल के इस कोने में ना कोई दर्द है ना दुख

दिल के इस कोने में पहुंचने का
एक रास्ता है
अगर तुम वास्तव में जीना चाहते हो
तो दिल में थोड़ी जगह बनाओ
इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाओ

इस दुनिया में फैले दर्द को मिटाओ
इसे बेहतर जगह बनाओ।


यह आलेख मनोवेद के नवंबर-दिसंबर अंक से लिया गया है

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