कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

अच्‍छे दिनों का पुराना पडा गीत - कविता


खालीपन भरने की कोशिश - रमेश प्रजापति

हताशा के कोहरे में लिपटी टहनियों पर
चिपकी बैठी है खामोशी
सुगबुगा रहे हैं खाली घोंसले।

चिंता की रेखाएं बना सूखा चमकता है
खलिहान की लोकधुनों के चेहरों पर
पसर रहा है उदास फसलों का खालीपन
ओर किसानों के सपनों में
चहचहा रही हैं चिडियां।

आकाश की नीरवता में टिमटिमा रहे हैं तारे।

सूखे कुएं के कानों में
आवारगी से फेंकी एक भारी आवाज
प्रतिध्‍वनित हो
गिरती है हमारी नीरवता में
गिरती है समय की धूल हमारी आंखों में।

दंगाइयों की दहशत से
शहर की गलियों में पसरे सूनेपन को
भर देती है भूख से बिलबिलाते
बच्‍चे की किलकारी।

दुल्‍हन भरती है खाली हाथों को मेंहदी से,
बेसहारा औरत अपने सूनेपन को भरकर
चूल्‍हे की राख को कुरेदती
गोद में बैठे निरीह खरगोश से
बांटती है अपना दुख-दर्द।

पिता की खाली चारपाई पर लौटता हूं तो
कुछ पल के लिए उदास खडे हुक्‍के के गुडगुडाने से
भर जाता है जानी-पहचानी गंध
आंगन का खालीपन
और बाजार से दूर
घर जैसा लगने लगता है घर।

बाजार की परिधि से
बाहर खडा
जेबों में खनक रहा है खालीपन
और बच्‍चों के चेहरे की उदासी
घुल रही है आत्‍मा में।

कुछ इस तरह भरता हूं अपना खालीपन
जैसे एक पूरा घर
खाली कनश्‍तर को भरने की जुगत में
खटता रहता है दिनभर।

जैसे अचानक कोई अच्‍छे दिनों का पुराना पडा गीत
बरसों से उदास पडी स्‍मृतियों के खंडहर को
भर देता है अपनी मीठी मीठी गंध से।

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