सोमवार, 23 नवंबर 2009

मैं भी ऐसी ही मौत पसंद करूंगा काम करते बिना लोगों को ज्‍यादा परेशान किए चल देना अच्‍छा है - रामकृष्‍ण पाण्‍डेय का जाना

तस्‍वीर देखने के लिए डबल क्लिक करें

पांव-पैदल और कितनी दूर ... गीत - रामकृष्‍ण पांडेय

पांव पैदल और कितनी दूर
थक गयी है देह थक कर चूर

थक गए हैं
चांद-तारे और बादल
पेड़-पौधे,वन-पत्तियां,
नदी, सागर
थक गयी धरती
समय भी थक गया भरपूर

नहीं कोई गांव,
कोई ठांव,कोई छांव
थक गयी है
जिंदगी बेदांव
और उस पर
धूप,गर्मी,शीत,वर्षा क्रूर

पांव-पैदल और कितनी दूर ...

पिछले दिसंबर माह में यह गीत लिखा था उन्‍होंने जिसे तब मैंने कारवां पर डाला था ...



पिछले पखवाडे मैं पटना था, तो एक सुबह अपने अनन्‍य मित्र राजूजी से मिला तो वे बोले आपके रामकृष्‍ण पाण्डेय गुजर गये,फिर उन्‍होंने स्‍थानीय दैनिक प्रभात खबर दिखलाया जिसमें मुख्‍यमंत्री ने वरिष्‍ठ पत्रकार और कवि को श्रद्धांजली दी थी। खबर पढ-सुनकर मैं भौंचक रह गया। मैंने दिल्‍ली अजय प्रकाश को फोन किया तो उन्‍होंने कहा कि हां अचानक बीमार पडे और...। मेरा सिम पटना में बदला था सो यहां के साथी मुझ तक सूचना नहीं पहुंचा सके।
पाण्‍डेय जी दिल्‍ली में मेरे रोजाना के साथियों में थे। साथी इसलिए कि उम्र के अंतर के बावजूद वैचारिक रूप से या सक्रियता के स्‍तर पर वे मेरे हमउम्र तो क्‍या युवा साथियों से भी ज्‍यादा सक्रिय या सजग थे। पिछले महीने रिटायरमेंट के बाद जब वे फिर से यूनीवार्ता से जुडे थे उसके पहले अक्‍सर दोपहर बाद उनका फोन आता, कि कहां हैं ... फिर पता चलता कि या तो वे साहित्‍यअकादमी लाइब्रेरी में हैं या मंडी हाउस या जहां कहीं भी हैं वे मंडी हाउस आ रहे हैं यह सूचना मिलती और मैं वहां पहुंच जाता अगर कहीं उलझा ना होता तो।
मंडी हाउस श्रीरामसेंटर के सामने वाली चाय की दुकान हमलोगों का मिलन स्‍थल था। मंगलवार को वहां अक्‍सर मजमा लगता लेखकों पत्रकारों का। अक्‍सर पंकज चौधरी और उमशंकर सिंह वहां उनके साथ होते फिर मैं आ जाता, शाम तक मदन कश्‍यप का फोन आता कि हैं , फिर वे जुटते फिर रामजीयादव,प्रेम भारद्वाज, रंजीत वर्मा कभी कभार अजय प्रकाश,सुधीर सुमन,कुमार इरेन्‍द्र आदि। अक्‍सर उनके साथ पहले से रामसुजान अमर होते जो उनके गहरे मित्रों में थे। फिर चाय आदि के साथ बातों का दौर चलता ,बहस आदि करते हम रात आठ के बाद धीरे-धीरे अपनी अपनी राह लेते।
अपनी सहज हंसमुख उपस्थिति से वे हमेशा वातावरण को सौम्‍य बनाए रखते थे, पर वैचारिक तौर पर हमेशा अपने स्‍टैंड पर अडिग र‍हते। रिटायरमेंट के बाद उन्‍होंने कहा कि अब अपने लिखे आदि को समेटा जाए। मैंने भी उन्‍हें उत्‍साहित किया था। कई विदेशी कवियों को उन्‍होंने अनूदित कर रखा था। पाब्‍लो नेरूदा की कविताओं का अनुवाद उन्‍होंने अपने एक प्रकाशक मित्र के कहने पर अरसा पहले संपादित किया था और दुखी थे कि उसने अब तक उसे प्रकाशि‍त करने की पहल नहीं की। इस बीच आरा से कुमार वीरेंद्र ने फोन किया कि कुछ अनुवाद अगर मैंने किये हों तो बताएं कुछ पुस्तिकाएं वे जनपथ की ओर से लाना चाहते हैं। तब मैंने पाण्‍डेय जी का नाम उन्‍हें सुझाया। पाण्‍डेय जी ने नेरूदा और लैंग्‍स्‍टन ह्यूज के अनुवाद उन्‍हें उपलब्‍ध कराए जो उन्‍होंने कर रखे थे। जनपथ से वे छप कर आयीं भी पर उस पर चर्चा के लिए आज वे हमारे बीच नहीं हैं।
हृदय की बीमारियों की अक्‍सर वे चर्चा करते और मुझसे होम्‍योपैथी की दवाओं पर सलाह लेते। रिटायरमेंट के आस-पास उनमें हृदशूल विकसित हो गया था मैंने उन्‍हें कहा तो बोले हां वैसा ही है। मेरे पिता को भी यह बीमारी है जिसके साथ वे दशकों से चल रहे हैं। चलते चलते अचानक उन्‍हें दर्द होता सीने में ,वे परेशान हो जाते और अक्‍सर वे धीरे धीरे चलते। पाण्‍डेय जी भी अक्‍सर ऐसी शिकायतें करते, संभवत: वे खुद के प्रति लापरवाह थे कुछ।
छह साल पहले जब मैं पटना से दिल्‍ली आया था तब कुछ दिन पाण्‍डेय जी के पडोस में रहा था तभी उनके मित्रवत व्‍यवहार से परिचित हो सका था। वहां वे अक्‍सर कविताएं सुनने सुनाने आजाते साथ बिना चीनी की काली चाय पीते। इधर उनके साथ अक्‍सर मैं भी बिना चीनी की चाय पीने लगा था। जब से पिता डायबिटिक हुए मेरी यह आदत हो गयी है कि चीनी की याद आने पर मैं बिना चीनी की चाय पीना पसंद करता हूं, वह स्‍वादिस्‍ट भी लगती है। जब कुमार वीरेंद्र आए थे जनपथ के सिलसिले में तो उन्‍हें लेकर उनके घर गया था मैं। साथ बैठ हमलोगों ने पपरा खाया और चाय पी। पपरा दाल को पीसकर बनाया जानेवाला खादय है जो बिहार के ग्रामीण इलाकों में अक्‍सर बनाया जाता है । मेरी मां भी पहले यह काफी बनाती थी।
इधर अरसे से उनकी शिकायत रहती थी कि मैं आने की कहकर आता नहीं, साल भर हो गया था उनके घर गये। सो पिछले महीने एक सप्‍ताह के अंतर पर दो बार गया था। तब उन्‍होंने अपनी चार किताबें दीं थी मुझे जिसमें एक उनका २००० में आया कविता संग्रह था और बाकी अनुवाद थे। एक किताब फिलीस्‍तीन कविताओं के अनुवाद की वे दे नहीं पाए थे कि उसकी एक ही प्रति थी उनके पास। उनकी इधर की कविताएं मुझे बहुत पसंद आती थीं। लिख कर अक्‍सर वे उसे सुनाने लाते। तब मैं उनकी हस्‍तलिखित कापी ले लेता अक्‍सर कि अपने ब्‍लाग पर डालूंगा इसे, खोएगी नहीं कापी आपकी, हंसते हुए वे थमा देते वह पन्‍ना फाडकर जिस पर कविता लिखे रहते।
जिसतरह उनसे राजाना की बात चीत थी अचानक खबर सुनकर मैं सन्‍न रह गया था। फिर सोचा मैं भी ऐसी ही मौत पसंद करूंगा काम करते बिना लोगों को ज्‍यादा परेशान किए चल देना अच्‍छा है।

कोई टिप्पणी नहीं: