बुधवार, 4 नवंबर 2009

ये जिद क्‍यों है कि मुझको आर पार दिखे

आंख ही नहीं दिखती, कहां से इंतिजार दिखे
बारहा तनहाई की सूरतें हजार दिखें

ज्‍वार आता है चला भी जाता है
खिजां की रूत में वो ढूंढते बहार दिखे

भूले से भी ना लब पे आया जिक्र मिरा
अपनी सूरत ही उनको बार बार दिखे

हवाएं चलती हैं रूत भी बदलती है
वो शै कहां है जो हर पल बेकरार दिखे

दिखने को तो दिख जाती है हर सू वो ही
ये जिद क्‍यों है कि मुझको आर पार दिखे

1 टिप्पणी:

अजय कुमार ने कहा…

अच्छा है , जोरदार है