कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पेंगुइन से आयी पुष्‍पराज की नंदीग्राम डायरी -आत्ममुग्धता और उद्धारक भाव - सुधीर सुमन

नंदीग्राम में माक्र्सवादी कही जाने वाली एक पार्टी अपने ही समर्थक किसानों के विरोध और असहमति को कुचलने के लिए लिए जिस बर्बरता और जिद पर उतर चुकी थी, उसने वामपंथ की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है, इसमें कोई शक नहीं। नंदीग्राम आज के जमाने के किसान प्रतिरोधों के लिए एक प्रेरक उदाहरण के बतौर देखा जा रहा है। नंदीग्राम के इसी दौर पर पुष्पराज ने एक डायरी लिखी है। जिनका खुद मानना है कि उन्होंने नंदीग्राम में संघर्ष के दौरान भूमिगत पत्रकारिता की, जीवन और मौत के एक छोटे से स्पेस के पास से गुजरे और ‘नंदीग्राम की यात्रा से लौटकर’ यात्रा के एक-एक पल को डायरी में दर्ज किया। हालांकि डायरी जिस अंदाज में लिखी गई है उससे पता नहीं चलता कि वे कितने दिन नंदीग्राम में रहे और कितने दिन वहां से बाहर। उन्हीं के शब्दों में- ‘10-15 दिन में दिमाग को आग से थोड़ी दूर हटाकर राहत दिलाने की कोशिश में हम कोलकाता आ जाते हैं।’ बाहर जाना उनकी मजबूरी थी, क्योंकि वे वहां जो घट रहा था उसकी जानकारी देश की मीडिया को बताना चाहते थे, उसी मीडिया तक अपनी रिपोर्ट भेजने के लिए उन्हें मेल, कुरियर, फैक्स चाहिए था, जिसकी लगातार वह आलोचना करते हैं कि उसे नंदीग्राम के किसानों की परवाह नहीं है, कि वह कारपोरेट समर्थक है। पुष्पराज डायरी के आखिरी दो पृष्ठों पर इस सवाल से जूझते हैं कि उनसे नंदीग्राम पर लिखने का मकसद क्यों पूछा जा रहा है, उन पर फारेन फंडिंग से साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए लिखने और माओवादी पत्राकार होने तथा कलकत्ता से दिल्ली हवाई जहाज में जाने वाला क्यों बताया जा रहा है? इस डायरी को पढ़ते हुए पुष्पराज माओवादी तो कतई नहीं लगते। जहां तक इस डायरी का मकसद है, तो यह डायरी नंदीग्राम में बलत्कृत औरतांे के प्रति ज्यादा संवेदित दिखती है। बलत्कृत औरतों के प्रति मीडिया की दिलचस्पी की आलोचना करते हुए भी खुद लेखक की चेतना बार-बार इससे ही ज्यादा आहत दिखती है। समर्पण का पहली पंक्ति गौरतलब है- नंदीग्राम की उन स्त्रियों के नाम जिनकी इज्जत लूट ली गई जिन्हें न्याय नहीं। हमारी भाषा भी कई बार हमारे मकसद और हमारी सीमा का पता दे देती है। सवाल यह है कि यह समर्पण उन औरतों के नाम क्यों नहीं है, जिन्होंने प्रतिरोध किया। हालांकि अपनी डायरी में वे यह जानने की ‘कोशिश करते हैं कि जिनके साथ बलात्कार हुआ है, वे महिलायें हतोत्साहित होने की बजाय ज्यादा आक्रामक होकर बलात्कारी को खोजने- पाया है! जहां कैडर बलात्कारी हंै, क्रूर हत्यारे और लूटेरे हैं, रंगदारी टैक्स वसूलते हैं, वहां उनके प्रति नफरत तो पैदा होगी ही। पुष्पराज ने नंदीग्राम की जो कथाएं कहीं हैं, उनमें सीपीएम पूरी तरह खलनायक है, उनमें किसानों का जीवट, धर्म के पार उनकी एकजुटता, स्त्रियों का जागरण सबकुछ है। लेकिन आपत्तिजनक यह लगता है कि लेखक भारी आत्ममुग्धता और उद्धारक भाव से भरा हुआ है। कुछ इस तरह का भाव है कि संघर्ष की इन अंदरूनी जानकारियों को हमने उजागर किया, वर्ना दुनिया को पता नहीं चलता। पुष्पराज ने 10 नवंबर को हुए तीसरे जनसंहार का जिक्र करते हुए बताया है कि राष्ट्रीय मीडिया में यह बात नहीं आई, क्यांेकि नंदीग्राम में प्रवेश का द्वार बंद था। इसके बाद ‘राज्यपोषित महाबलात्कार’ और कत्लेआम पर चुप्पी को लेकर वे राजनीतिक पार्टियों की सत्तालोलुपता, बाजारवाद के साथ-साथ मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाते हैं। उन्हें लगता है कि ‘गुजरात के दंगों के बाद धर्मनिरपेक्षता का जो चेहरा उभरकर सामने आया, वह नंदीग्राम के सवाल पर चुप रह गया।’ क्या धर्मनिरपेक्षता का जो चेहरा है वह महज सीपीएम समर्थक है? सवाल यह है कि इस चुप्पी से ‘देश के सुविधावादी’ ‘बुद्धिवादी’, ‘असंवेदनशील’ बौद्धिक वर्ग को क्या फायदा होने वाला था? और क्या बुद्धिजीवियों ने पूरे देश में इसका विरोध नहीं किया? इस डायरी में असंगत और गैरजरूरी उदाहरणों, उपमाओं और तथ्यों की भी भरमार है। भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर का बयान, संदीप पांडेय का गोरखपुर के डीएम को हटाने संबंधी बयान, मास्टर साहब किताब के बारे में महाश्वेता देवी का कथन या बाढ़ को बीबीसी द्वारा दैवी आपदा कहा जाना इसकी बानगी हैं कि लेखक जो सुनता है और लिखता है, उसके तथ्य और संदर्भ के प्रति गंभीर नहीं है। संशय होता है कि यही अगंभीरता रिपोर्टिंग में भी न हो, जैसे एक बार तो लेखक पुलिसिया साहब के साथ मौजूद सरकारीकर्मी के हवाले से फोन से जानकारी हासिल करता है। सीआरपीएफ के अधिकारी जिस लहजे में उसे जानकारियां देते हैं, वह भी दिलचस्प है। महाश्वेता देवी बंदर बेचती थीं या महिषादल में हिंदी कवि निराला का बचपन गुजरा था, इस तरह के अवांतर प्रसंग डायरी को अगंभीर बनाते हैं। माओ की तस्वीर देखकर यह कहना कि सीपीएम को माओ पसंद हैं माओवादी नहीं या इस तरह के उदाहरण देना जब अरुंधति राय के घर पर कोई गोली दागने का हक नहीं रखता तो मुक्तिपद मंडल के घर पर गोला-गोली बरसाने का हक किसी हरमात वाहिनी को क्यों, बड़ा बचकाना लगता है। संसद में प्रियरंजन दास मुंशी ने कामरेड सीताराम येचुरी की बोलती बंद कर दी, यह कौन सी भूमिगत रिर्पोटिंग है? प्रियरंजनदास मुंशी अगर नंदीग्राम के बारे में ज्यादा जानते हैं और भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के संपर्क है, और इसके बावजूद वे बुद्धदेव सरकार के खिलाफ कुछ क्यों नहीं करते, इस चुप्पी की राजनीति पर लेखक अगर ठीक से सोचता तो ज्यादा बेहतर होता। देष की बड़ी आबादी की सहानुभूति नंदीग्राम के प्रतिरोध करने वाले किसानों के साथ है, लेकिन इस सहानुभूति को लेकर देष भर में कोई बड़ा किसान आंदोलन खड़ा करने या नंदीग्राम से पूरे देष के किसानों को दिषा देने का स्वप्न देखने वाले किसी भी लेखक या पत्रकार को उतावलेपन और अगंभीरता से बचना चाहिए। इस डायरी को जरा सचेत

1 टिप्पणी:

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

सुधीर भाई ने सही कहा है
इसे सावधानी से पढे जाने की ज़रूरत है।