सोमवार, 7 सितंबर 2009

कैसे आ गए हैं वे एक जेब में - खालिद ए खान

एक कूड़ा बीनता लड़का
खिड़की से
नजर आ जाता है अक्‍सर
चूम चूमकर
रखता जाता है
जेब में अपनी
तमाम मजहब के
उन खुदाओ को
जिन्‍हें नए साल में
बहार कर हमने
दिया था फेक
घूरे पर
कैसे आ गए है
एक जेब में वे
अभी नहीं तो
रात में जरूर
वे करते होगे
दंगे !

3 टिप्‍पणियां:

Apoorv ने कहा…

उम्मीद है आपकी इस कविता को पढ़ कर सारे लड़ाकू खुदाओं और उनके कलह-प्रिय शागिर्दों को कुछ समझ आयेगी..एक सशक्त और प्रभावी रचना के लिये बधाई.

मीनू खरे ने कहा…

सशक्त रचना. बधाई.

सुलभ सतरंगी ने कहा…

प्रभावी रचना. बधाई.