शनिवार, 5 सितंबर 2009

मन के किसी कोने में ... अदनान बिस्मिल्‍लाह

मन के किसी कोने में
दुबकी हुई
शांत चीख
कभी-कभी
चिहुंक उठती है
हौले से उठ
दरवाजे के झीने से
देखती है...
शताब्‍दी के शैशव को

बाहर शताब्‍दी
अनंत तक
सतरंगी मौत के वैभव का
आंचल मुख पर डाले
सो रही है ...

अनचाहा गर्भ

उसकी काया
काल की धुरी पर
घूम रही थी
चक्‍कर लगाती रही
चक्‍कर दर चक्‍कर
अविरल...
अथक...
और सिमट गयी
पेट की मांद पर
आंख,गाल भींच लिए अंदर को
चेहरे , छाती की हडिडयां
बाहर उलट पडीं
और उसने महसूस किया
पेट में जैसे
अनचाहा गर्भ ठहर गया है...

कानून के दरवाजे पर

हर बलात्‍कार के बाद की
खामोश चीख
कानून के दरवाजे पर
दस्‍तक देती है

चीख अंदर पहुंच
गुफा के अंधेरे
बंद कमरे में
बलात्‍कार की
यातनाओं की चित्‍कार
सीने में दबा
अपनी अस्‍मत को
एक बार फिर
दफ्न कर देती है
और देश का चक्र
उसे बिस्‍तर पर
रौंदता है बार-बार

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