मंगलवार, 18 अगस्त 2009

प्‍यार कुछ कविताएं - सुधीर सुमन


प्यार
1
दीवारें हैं
घेरे हैं कई
उन्हीं में चक्कर काटते
जीते हैं लोग
अपने संबंध, अपने प्यार
मेरी मुश्किल यह कि
जो संबंध बनता है
जो प्यार आता है
वह रिवाजों को धत्ता बताता
तमाम दीवारों से टकराता
कई मुश्किलों से जूझता
आता है
मगर देर तक
टिकता नहीं,
उसे दोष कैसे दूं
मुश्किलों के हैं बड़े फसाने
जबकि संगी-साथी कहते हैं
प्यार मुझसे संभव नहीं

2
अभावों के बीच
उतरा वह
कुछ यकीन-सा दिलाता कि
अभी भी भावों का मोल है
अभी भी
दुनिया के अर्थशस्त्र
जमाने की दुनियादारी की
परवाह नहीं,
वह आया तो
लौट आए
कितने खोए हुए गीत
सोचो तो जरा
वह है क्या
जिसमें डूब गए हैं
अभावों के सारे गम

3
जहां भी जाता हूं
प्यार से भरपूर
दो बड़ी खूबसूरत आंखें
छायी रहती हैं मुझ पर
या यूं कहें
उनमें कहीं घुला रहता है
मेरा अस्तित्व
4
कभी घुमता-भटकता
मानसून इधर भी आता है
बादल इस तरह भी आते हैं
रेगिस्तान में
कोई गहरी पुकार
बुलाती है
कोई स्वप्न में भी
फिक्रमंद दिखता है मेरे लिए
दो अजनबी
हुए जाते हैं आषना
क्या यही प्यार है?


5
दुनिया के गोरखधंधे में
छुपकर बचने की कोशिश नाकाम
आसान नहीं बचना
इस बावरी बयार से
नैनों के भंवर में जो गिरा
फिर उसे डूबने की फिक्र क्या
ख्वाब और हकीकत ने
अपनी अपनी सरहदें
तोड़ दी है
ख्वाब बदल रहे हकीकत में
और हकीकत हुए जा रहे
ख्वाब से हसीन
बाबा आदम के जमाने से
जो उलझी है
उसे क्यों सुलझाउं
रहे, बहे धमनियों में

6
तुम्हारे साथ
जीवन के उलझे सवालों को
सुलझाना
सुलझाते-सुलझाते उलझ जाना
अच्छा लगता है
तुम्हारे साथ
मुक्तिबोध, फैज, त्रिलोचन, शमशेर से गुजरना
अथाह रोमांच से भरा है,
तुम्हारे साथ
दुख भरी दुनिया की थाह
उसे बदलने की चाह को
और बढ़ाती है
तुम्हारे शोहबत में
मेरी सहजता मिलती है मुझे
जैसे बचपन लौट आया हो
तुम्हारा साथ
मेरे सोए दार्शनिक को जगाता है
तुम्हारा साथ पाकर
जीवन की तमाम रंगीनियां
पाने को
जी चाहता है
मौत को हमेशा के लिए
अलविदा कहने और
फिर से सजने-संवरने को
जी चाहता है।
7
तुम्हारे जाने के बाद
खुद को ढूंढता हूं मैं
खालीपन के अहसास को
नहीं भर पाते सिगरेट के धुएं
मेरा ही कमरा
पूछता है मुझसे
आजकल तुम रहते हो कहां
अपनी ही तलाश में
देखता हूं आइना
कि चिपक जाती है
तुम्हारी काली बिंदी
मेरे चेहरे के प्रतिबिंब से
ऐसा लगता है
तुम्हारा चेहरा घुल रहा
मेरे चेहरे में
तुम्हारी आंखें
समा रहीं मेरी आंखों में
तुम्हारे मुस्कुराते होठ
मेरे दर्द भरी मुस्कान को
ले लेते हैं अपने आगोश में
किसी खोए हुए
खूबसूरत अतीत के बोझ की मारी
मेरी सूरत बदलने लगती है
तुम्हारी सूरत मेरी सूरत पर
छाने लगती है।

8
तुम्हारे अहसास में गुम
जोडूंगा टूटे-फूटे अल्फाज
जो तुम्हारे दिल में भी उतरेगा
पर आदतन शरारत कर जाओगी-
लल्लू ही रहोगे तुम
ऐसी होती है कविताएं,
मैं पूछूंगा-
कैसी होती है,
तुम कुछ कहोगी
मैं कुछ कहूंगा
इस तरह हम जीते जाएंगे
एक अद्भुत कविता
हम पूछेंगे खुद से
क्या हम खोए हैं
किसी फिल्म या साहित्य में
पर वे हमारे जीवन से बड़े तो नहीं
उनमें भी हमारा जीवन ही तो है
जीवन के ये अहसास
उतने ही मौलिक हैं
जैसे कोई बच्चा
अपनी नन्हीं उंगलियों से
अपनी मासूम आंखों से
महसूस करता है
धरती के रंग
उसकी आंच ...


सुधीर सुमन लघुपत्रिका जनमत के संपादक हैं।

1 टिप्पणी:

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायें