कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 24 अगस्त 2009

तेरे वो अश्रुकोष कहां हैं - राजू रंजन - नवतुरिया

राजू कंप्‍यूटर विज्ञान के छात्र हैं कविता में रूचि है , देखें कि वे क्‍या देख पा रहे हैं -

विकल व्‍योम से मत पूछो
तेरे वो अश्रुकोष कहां हैं
उपवन पुष्‍प से मत पूछो
तेरे वो मधुकोष कहां हैं
शुष्‍क हृदय के अंधकक्ष से
मत पूछो आनंद कहां है
लीन नयन से मत पूछो
पलकों का स्‍पंद कहां है
कालचक्र से मत पूछो
उल्‍लास का वो प्रारब्‍ध कहां है
प्रेमपंथ में भटके पथिक से
मत पूछो संयोग कहां है
गगन के इस अंतस से न पूछो
उसका शब्‍दहीन उच्‍छवास कहां है

1 टिप्पणी:

Nitesh Singh Rathor ने कहा…

Bhav aur ras ki kushalta kafi utkrist roop mein samayojit kiya gaya hai..yeh kavita nischai hi hindi sahitya ke pracheentam roop ko smaran karati hai. "Ram dhari singh dinkar, Maithlisaran gupt,Sumitra Nandan Pant" aadi kaviyon ke mahan yug ko fir se jivit karne ka pryaas kiya gaya hai.. Veer Ras ko yatharth roop mein prastut ki gayi ek Manoram kavita hai.....Hume yeh jaankar kafi prasanta hui ki aisi pratibha ab bhi is bharatvarsh mein jivit hai sath hi dukh bhi hai agar ye jivit hai to abtak kyon andhkaar mein thi....