कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 16 अगस्त 2009

तितलियां - कविता - कुमार मुकुल

यह कविता 2000 में लिखी थी तब मैं पटना से अमर उजाला दैनिक का संवाददाता था। आलोचना के वर्तमान अंक में यह कविता प्रकाशित है।

नवंबर के इस महीने में
सीटीओ के फैक्स रूम में
तितलियां भरी पड़ी हैं
सब की सब
भूरी धूसर व काली हैं
नीली
प्लास्टिक पेंट चढ़ी दीवारों
पर
एक फुट के घेरे में
पांच-छह तितलियां बैठी हैं
वहीं एक मोटी सफेद छिपकली
लटकी है दीवार से
उनकी ओर से मुंह फेरे

फिर नीचे देखता हूं
रजिस्टर के किनारों पर
शीशे की दीवार पर
और तितलियों से भी
ज्यादा मटमैले हो चुके
घरर-घरर आवाज निकालते
एअर कंडीशनर पर
फैक्स के तार पर
बिजली के स्वीच पर
टेलीप्रिंटर के पीछे
मैं गिनने लगता हूं उठकर
एक-दो-तीन पांच-दस
सोलह-चैबीस अट्ठाइस
अरे रे
कितनी तितलियां हैं यहां
क्या कोई
भाग नहीं रहा इनके पीछे !

नीचे भी गिरी हैं दो-तीन
अधमरी कुचली गई पांवों से
खंडित पंखों वाली

टेलीप्रिंटर पर बैठे
हिंदू के संवाददाता
बालचंद से
पूछता हूं मैं
देखिए तो
कितनी तितलियां हैं यहां
तीस के करीब
कुछ
दराज और आलमीरे के पीछे भी होंगी

बालचंद पूछते हैं
कि तितलियां हैं ये
इनमें तो
रंग ही नहीं है बाकी
फिर गंभीर होते बोलते हैं वे
जानते हैं
ये तितलियां यहां क्यों आई हैं
मरने आई हैं ये
देखिए
कैसी
निस्पंद हैं सब मृत सी

शायद
ठीक हैं वे
अब मुझे पटना संग्रहालय में
शीशे के पीछे
रसायनों के लेप से सुरक्षित
हजारों मृत तितलियों की
याद आती है
उनका भी रंग
करीब-करीब ऐसा ही
धूसर पड़ चुका है
फैक्सरूम में
एक तितली को छूता हूं मैं
पहली दफे वह
कोई प्रतिक्रिया नहीं करती
तीसरी बार कुरेदने पर
उस पड़ती है चिमगादड़ों सी
खुले में भागने का अंदाज
गायब है उसका
एक मशीनी लय में
उसके पंख झपक रहे हैं
फिर वह बैठ जाती है रजिस्टर पर

उधर
आधे दर्जन तितलियों के बीच
वह छिपकली
तटस्थ है कैसी !
वह क्यों नहीं खा रही तितलियों को
क्या उसे भी उनकी मौत की ख़बर है

बालचंद बताते हैं कि
छिपकलियां भी चुनाव करती हैं
फैले पंखों के चलते
रुचि नहीं ले रहीं वे

सामने
प्लास्टिक के ट्रे में पड़े काग़ज़ों पर
निस्पंद बैठी
एक तितली दिखती है
मैं बालचंद को दिखाता हूं
कि इधर आकर देखिए
इसके पंखों के बीच
दो-तीन रंगीन बिंदिया हैं
उठकर आते हैं वे
मैं दिखलाता हूं
देखिए उसमें कितने रंग हैं
सफेद-लाल-काला-कत्थई
मेरे विश्लेषण को अनदेखा करते
अपना गंभीर निर्णय सुनाते हैं बालचंद
‘मैंने कहा ना
कि तितलियां मर रही हैं
देखिए यह तितली मर रही है
इसीलिए इसके पंख ऐसे खुले हैं
जमीन के समानांतर’

उसे छूता हूं मैं
वाकई
कोई हरक़त नहीं होती पंखों में
मर चुकी हैं वो
बालचंद बताते हैं कि
इस तरह तभी पंख खोलती है तितली
जब वह उड़ान भर रही होती है
पर उस बखत
पंखों के बीच का कोण
घटता-बढ़ता रहता है हमेशा
पर इस तरह
180 डिग्री का कोण बनाने का मतलब
कि पंखों के बीच का तनाव
समाप्त हो चुका है
और मर चुकी हैं वो

वाकई गहरी नज़र है बालचंद की
इस कमरे में कोई खिड़की नहीं
एक दरवाज़ा है
उसमें भी पल्ला है छोटा-सा
हाथ घुसाकर
फैक्स का काग़ज़ देने भर
फिर इतनी बड़ी संख्या में
कहां से आ घुसी हैं वे
क्यों आ घुसी हैं

फिर सबकी सब
ऐसी धूसर क्यों हैं
क्या तितलियों का सतरंगापन
एक पुराकथा होने जा रही है

बाहर निकलकर हम
चाय की दुकान पर आते हैं
वहां भी तितलियां काफी है
वैसी ही धूसर एकरंगापन लिए
जैसे नए बसते शहरी इलाक़ों में
अल्लसुबह
सूरज के सात रंगों को धूसर करते
एक सी बेश-भूषा वाले मजूर
भरे रहते हैं
अपने श्रम के मोल के इंतज़ार में

दुकान पर तितलियां
चाय के जूठे ग्लास पर बैठी हैं
और फेंकी गई कत्थई
काली चाय की पत्तियों पर...
जहां बैठा बाल श्रमिक
ग्लास धोता
उनसे छेड़-छाड़ करता
अपना मन बहला रहा है
क्या बच्चे का मन बहलाने
यहां आ गई हैं तितलियां
या चाय की शहरी आदत ने
जुटा दिया हैं उन्हें

चाय की पत्तियों
और तितलियों
और बच्चों के रंग में
कैसी समानता है
दुकान के ऊपर
कंदब की डाल लटकी है
औ कदंब फूले-फले हैं
कदंब के फूल भी
तितलियों जैसे धूसर हैं
फल नारंगी हैं
और ज्यादा पके फल
फिर धूसर हो रहे हैं
उन पर भी बैठ रही हैं तितलियां

कस्बाई महानगर का
धुआं और शोर की आमदवाला
इलाका है यह
धूल का तो साम्राज्य ही है यहां
और उस धूलिया माहौल में
अस्तित्व के अपने संघर्ष में
रंग खो रही हैं तितलियां
(खदान मजदूरों सा

यहां से दस किलोमीटर दूर
धूल-धुआं-शोर से अलग
अपने पुस्तैनी मकान की खिड़की से
बाहर घास-पात पर
बैठती तितलियों को
देखा उसके बाद
तो छोटे बेटे को उन्हें दिखाते
फिर याद किया उनका रंग
यहां भी वैसी ही तितलियां थीं
कुछ उनसे ज़्यादा सादी
और सादे नारंगी रंग की

पर वह पीली तितली
कहीं नहीं दिखी
जो मेरे बचपन में
कंटीली झाड़ के ऊपर खिले
अपने जैसे ही पीले फूलों पर
मडराया करती थी
हम उनके पीछे भागते थे
दबे पांव
और पांवों में गड़ जाते थे महीन कांटें
जिन्हें पांवों से निकाल
हम फिर भागते थे
पर पकड़ में नहीं आती थीं वे

हां
हेलिकाप्टर की शक्ल वाली
जलते बल्ब के नीचे
वैसी ही खडर-खडर
आवाज़ करने वाली
टिकलियों को
घागों से बांधकर
जरूर उड़ाया था बचपन में

सचमुच की
रंगीन तितलियां जब
गायब हो रही हैं परिदृश्य से
प्लास्टिक की बहुरंगी तितलियां
घर कर रही हैं

अजय के यहां बेटे ने
प्लास्टिक की नीली-काली
तितलियों की
मांग कर दी
जो चिपकी थीं दीवार पर
जबकि घर पर खिड़की के बाहर
उड़ान भरती तितलियों को देख
डर रहा था वह
कि पापा काट लेगी तितली
या वह आनंद के लिए
तितलियों द्वारा काटे जाने के भय को
कल्पना में
वृहद आयाम दे रहा था

क्या तितलियां बदल रही हैं
या समाप्त हो रही हैं

क्या कल को वे भी
पक्षियों की तरह
स्मृतियों के भरोसे
आएंगी कविता में !

1 टिप्पणी:

rubel ने कहा…

dheere dheere titlhamari smiriti se bahar hoti jayenge ,kya aise hi ek din hume bhi manushyata se bahar kar diya jayega?yeh kavita hamare ird gird ke asamvedansel hote vatavaran ka gahan path nirmit karti hai.smiriti aur yatharth ke dvandh ke madhyam se is kavita me vartman ka bahuayami drishya prastoot kiya gaya hai.itni achi kavita ke liye iyan badhai.achyutanand mishra