कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 8 अगस्त 2009

लेकिन अपनी हंसी न छीनना मुझसे,गुलाब न छीनना - पाब्‍लो नेरूदा की प्रेम कविताएं


इधर साहित्‍य अकादमी की लाइब्रेरी से नेरूदा की कविताओं का अनुवाद पढा। अनुवाद मधु शर्मा ओर सुरेश सलिल का किया था। उसमें उनकी चर्चित बीस प्रेम कविताओं के अलावे भी कुछ कविताएं संकलित थीं । उन्‍हीं से कुछ कवितांश प्रस्‍तुत हैं यहां .......

मैंने तुम्‍हें नाम दिया महारानी का
तुमसे ज्‍यादा कददावर लोग हैं
ज्‍यादा खरे
ज्‍यादा खुशनुमा
लेकिन तुम हो महारानी
जब तुम सामने आती हो
सारी नदियां मेरे भीतर कल कल कर उठती हैं
घंटियां आसमान में गूंजने लगती हैं
सिर्फ तुम और मैं मेरे प्‍यार
सिर्फ मैं और तुम
उसे सुनते हैं.............................

तुम्‍हारा अनार जैसा चौडा खुला मुंह
तुम्‍हारे लाल केश
मेरी छोटी मीनार
लेकिन मैं तुम्‍हारे पैरों को प्‍यार करता हूं
महज इसलिए
कि वे धरती पर चले
हवा पर चले
सागर नदी झीलों पर चले
और चलते रहे
जब तक मुझे पा नहीं लिया.............

तुम्‍हारे हाथ जब आगे बढते हैं प्रिय
मेरे हाथों की तरफ
वे उडते हुए क्‍या लाते हैं मेरे लिए
क्‍यों रूक गए थे वे मेरे मुंह पर एकाएक
तुम्‍हारे हाथ जब तक कि मेरे सीने से सट नहीं गए
और वहां दो पंखों की भांति
उन्‍होंने अपनी यात्रा समाप्‍त नहीं की............

रोटी मुझसे छीन लो अगर चाहो
हवा छीन लो
लेकिन अपनी हंसी न छीनना मुझसे
गुलाब न छीनना मुझसे
कठिन कठोर संघर्ष है मेरा
थकी और भारी आंखें लिए मैं वापस आता हूं
लेकिन जब तुम्‍हारी हंसी फूटती है
आसमान तक उठ जाती है मुझे तलाशती हुयी
और जिंदगी के सारे दरवाजे मेरे लिए खोल देती है

मेरे प्‍यार सबसे काले दौर में भी
प्रकट होती है तुम्‍हारी हंसी
हंसो रात पर
हंसो दिन पर
चंद्रमा पर हंसो
इस द्वीप की बलखाती गलियों पर हंसो
हंसो इस बेढंगे बालक पर
जो तुम्‍हें प्‍यार करता है

रोटी को बेशक इन्‍कार कर देना ...
पर हंसी को कभी नहीं , कभी नहीं
वरना मैं मर जाउंगा..........

ओ अनुपमा

तुम्‍हारी आंखे बहुत बडी हैं तुम्‍हारे चेहरे के लिए
तुम्‍हारी आंखें बहुत बडी हैं इस पृथ्‍वी के लिए
ओ अनुपमा
तुम्‍हारी आवाज तुम्‍हारी त्‍वचा तुम्‍हारे नाखून
तुम्‍हारी हस्‍ती तुम्‍हारी रौशनी तुम्‍हारा अंधेरा
मेरा है
वह सब मेरा है ओ मेरी प्रिया
तुम जब पास होती हो
तुम जब दूर होती हो
हरदम तुम मेरी हो ओ प्रिय.................

हमारा प्रेम एक खुरदरी रस्‍सी है
जो हमें बांधती है और जख्‍मी करती है
और अगर हम जख्‍मों से छुटटी पाना चाहें
अलग होना चाहें
तो एक नयी गांठ पेश कर देती है हमारे लिए
और हमें अपना खून बहाने और एक साथ
जल मरने की सजा देती है...................

अगर तुम अपनी जिंदगी मुझसे ले लेती हो
तो तुम जीते जी मर जाओगी
फिरती रहोगी मारी मारी मेरे बिना
बेजान
या साये की तरह ........

कभी कभी तुम धंसी जाती हो
जा गिरती हो
अपने खामोशी के गडढे में
गरबीले गुस्‍से के अपने खडड में
और मुश्किल से ही वापस आ पाती हो
मेरे प्‍यार
क्‍या मिलता है तुम्‍हें
अपने अंधकूप में
प्रिय जिस कुंए में गिरती हो बार बार
नहीं पाओंगी वहां वह कुछ
जो मैं सहेजे हूं तुम्‍हारे लिए उंचाइयों पर...
डरो नहीं दुबारा अपने विदवेष के गर्त से
परे झटक दो मेरे उस शब्‍द को
जो आहत करने के इरादे से तुम्‍हारे निकट पहुंचा
प्‍यार करो मुझे
ओ मेरी तुम
मुस्‍कान बिखेरो मुझ पर
ताकि मैं अच्‍छा आदमी बन सकूं
ठेस मत पहुंचाओं मेरे भीतर सहेजे अपने खुद को
बेकार होगी वह हरकत
उससे खुद तुम्‍हें ठेस पहूंचेगी..........

अगर तुम भाडा नहीं चुका सकतीं
काम की तलाश में निकल पडो
गरबीले डग भरती
और याद रखो मेरे प्‍यार कि
मैं तुम्‍हारी निगरानी पर हूं
और इकटठे हम सबसे बडी दौलत हैं धरती पर ..............

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