बुधवार, 22 जुलाई 2009

मैं तुम्हें देखता हूं, तुम्हें जानता हूं, तुम्हें चाहता हूं ...

यूनेस्को के महानिदेशक रह चुके स्पैनिश कवि फेडेरिको मायोर की कविताएं पढ रहा था ,बहुत गहरी है ये कविताएं ,उनके कुछ कवितांश पढाता हूं आप सबों को भी

मैं इतना अभागा
हे समुद्र
मैं इतना दरिद्र
और तुम्हारे पास गहराई
रंगों और क्षितिजों की ढेर सारी पूंजी
किन्तु फिर भी तुम मेरी शक्ति का
सामना नहीं कर सकते
मैं तुम्हें देखता हूं
तुम्हें जानता हूं
तुम्हें चाहता हूं ................

आपने जीवन के
हर क्षण का आनंद लो
यह सोचकर
कि तुम बस उसे खोने वाले हो.....................

हममें में से हरेक की
अनंत गहराइयों के भीतर
सब वस्तुओं का प्रारंभ है.........

अपने फिजूल के दिखावे के विलाप से
तोडों नहीं इस मौन को
इस अनंत सागर के स्वर को
इन तारकों के कोलाहल को
दीन हीन समझते हैं
उनकी अर्थ भरी भाषा को..............

इस रात से
और इस सागर से
इतनी सारी रोशनी छलक रही है
अनंत अपार
मुझे तुम्हारे अधबुझे दिये की जरूरत नहीं ............

बडे सवेरे ही
हो जाता है अतीत
अर्थहीन

धुंधलका हुआ तो क्या
हमें तो चलना है
केवल सुबह बोलती है
और सोचती है सारी दुनिया
कि वह प्रबुद्ध है
अगर रात फिर घिरी
तो प्यार
केवल परछाइयों को जीत पाएगा
और रोशनी का मार्ग
ढूंढा जाएगा नये सिरे से.....

हमें बढना है आगे
यह सोचकर
कि केवल भविष्य ही मरा नहीं है ......

मेरे समुद्र
हमारे समुद्र
कौन लेता है तुम्हें
धुंध में लपेट ...

यह समुद्र
यहां फिर भी रहेगा
लहरों में इठलाता
जब तुम और मैं नहीं रहेंगे ...........

कैसी उदासी
कैसी खुशी
जब यह समुद्र यहां फिर भी रहेगा
अनंत काल तक
जब हम तुम नहीं रहेंगे........

साथ साथ देखने
आपस में बातें करने
हाथ में हाथ लेकर चलने में ही
छिपा है सामाधान .....

मैं जा रहा हूं और
यह सागर भी जा रहा है मेरे साथ ...

अपने साहस को
इतना शीघ्र न तजो
हर चीज हर सुबह फिर शुरू होती है
निराश मत हो
अंत में सूर्य तो हमेशा ही चमकता है .......

1 टिप्पणी:

nidhitrivedi28 ने कहा…

bahut gahari kavita hai...