कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 6 जुलाई 2009

सब मिलते पिकासो से ...


सादा लेटर पैड और पेंसिल लिए
सोचता हूं
उसके वक्षों के सौंदर्य की बाबत
कि उन्हें उतार पाता
इन पन्नों पर ...

आंखों से
तो बोल ही रहा था मैं
सुना भी था उसने
और इठलाती रही थी पूरे वक्त
अपने कमउम्र साथी या भाई
जो भी था
उसके बहाने

क्या बस से उतर जाना चाहिए था मुझे
उसके पीछे–पीछे
और पिकासो की तर्ज पर
बोल देना चाहिए था बेलाग –
कि माशाअल्लाह, आपका जवाब नहीं
और आपकी इस पौने छह फुटी काया का भी
और चश्मे के भीतर से परखती सी आंखें
बस ब्‍लैक होल सी आपकी हंसी लगती थी
सब लील लेने को आतुर

कुछ समय देतीं आप
तो ये कंट्रास्टं
उतार पाता कैनवस पर

पर अगर कहीं अपनी मस्ती चाल चलती
मुडकर चल देती वह
मेरे पीछे
तब

तब क्या करता मैं
कि पिकासो की तरह कहां संभव है मेरे लिए
पूंजी का विशाल स्टूडियो
कई प्रवेशद्वारों वाला
कि जिनमें एक से मॉडल प्रवेश करती
दूसरी से पत्नी
और तीसरी से प्रेयसी
और कोई
किसी से मिल नहीं पाता

सब मिलते पिकासो से।

1 टिप्पणी:

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

बड़े दिन बाद भेट हुआ आपसे और क्या खूब मिले जनाब...बढिया कविता....कभी हमारी बैठक पर भी आएं...
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