कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 24 जून 2009

चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते-लीडिया चेखव- एक प्रेम कथा

अगली मुलाकात में चेखव ने लीडिया को उपन्‍यास लिखने की सलाह देते कहा - ... एक स्‍त्री को ठीक उसी प्रकार लिखना चाहिए जैसे कि वह कुछ काढती है। खूब लिखो और पूरे विस्‍तार में लिखो। लिखो और काटो। फिर लिखो - फिर काटो।
इस पर लीडिया ने कहा - यहां तक कि कुछ बाकी ही न बचे...
इस पर नाराज होते चेखव ने कहा - तुम बहुत खराब औरत हो ... जीवन जैसा है बस वैसा ही। लिखोगी न ...
तब लीडिया ने कहा - हां, लिखूंगी। ... मैं एक आजाने व्‍यक्ति की प्रेम कहानी लिखूंगी।...वह व्‍यक्ति जिसे आप जानते तक नहीं, आपको बहुत प्‍यारा हो गया है...क्‍या यह बेहद दिलचस्‍प नहीं है...
इस पर मजाक करते हुए चेखव बोलते हैं - जी नहीं। कतई दिलचस्‍प नहीं, प्‍यारी बच्‍ची।
यह संबोधन सुन लीडिया देर तक हंसती रही। चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते।
अंत में अगले दिन तक के लिए विदा होते चेखव ने उसे फिर उपन्‍यास लिखने की याद दिलाते कहा कि तुम लिखो कि कैसे तुम एक सैनिक अफसर के इश्‍क में कैद थीं।
फिर चेखव ने कहा कि तुम मुझ पर गुस्‍सा नहीं करोगी।...स्‍त्री को सदा स्‍नेहमयी और कोमल हृदय होना चाहिए।
अगली शाम चेखव लीडिया के घर खाने पर आमंत्रित थे। उसके पति कहीं बाहर गये थे। बच्‍चे चेखव से मिलकर सोने चले गए। हल्‍का खाते-पीते चेखव ने पहली बार अपने प्‍यार का इजहार करते कहा - क्‍या तुम्‍हें मालूम है ... इतना प्‍यार तो मैं दुनिया की किसी भी अन्‍य स्‍त्री से नहीं कर सकता ।... तुमसे बिछडना कितना दुश्‍वार होगा मेरे लिए। ... तुम्‍हें केवल पवित्र और निष्‍कलुष प्‍यार ही किया जा सकता है।...तुम्‍हें स्‍पर्श करते मैं डरता था,कहीं रूठ न जाओ ... यह कहते उन्‍होंने लीडिया का हाथ पकडा और तुरत छोड दिया ... उफ कितना ठंडा हाथ है ...

2 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत सुंदर! ऐसा प्रेम चेखव ही कर सकते थे।

Arvind Mishra ने कहा…

स्‍त्री को सदा स्‍नेहमयी और कोमल हृदय होना चाहिए।
जी हाँ !