मंगलवार, 30 जून 2009

जिन्दगी तू वाकई एक खूबसूरत शै है

जिन्दगी तू वाकई एक खूबसूरत शै है
पर यह कैसे तय हो
कि तिरी शुरुआत कहां से है
या तिरी पुरअसर तस्वीर कैसी है

कि मैं अगर कहूँ
कि तुम मुस्कान की एक गहरी और तल्ख लय हो
तो मुस्कुराने से बनी झुर्रियों को
कहाँ छुपाएं
या मैं वो नक्शा कैसे बनाऊं
कि जिसमें एक उफनती नदी हो
पर जिसके किनारों पर रेत न हो
क्या यह मुनासिब है
कि घटाओं से वज्राघात को अलग दिखाऊं
ऐसा क्य़ों है कि झुर्रियां जब
चेहरे पर पड़ें तो भूत दिखाएं
और हाथों में भविष्य
तलुओं में पड़ें तो बिवाई कहलाएं
और बिवाई न हो
तो पीर पराई कैसे हो

जिन्दगी
यह कितनी भद्दी और खरी बात है
कि हर तितिली
एक पिलुआ (लार्वा) का रुपांतरण है
और समूची रामायण के मानी सीता-हरण है

3 टिप्‍पणियां:

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

जिन्दगी तू वाकई एक खूबसूरत शै है
पर यह कैसे तय हो
कि तिरी शुरुआत कहां से है
या तिरी पुरअसर तस्वीर कैसी है
बहुत अच्छी रचना है.
कुछ पंक्तियों में सब कुछ
कह देना आसान नहीं होता.
ज़िन्दगी का कुल फलसफा
आपने इस रचना में कह दिया.
बहुत बधाई.

ओम आर्य ने कहा…

मुकुल जी, जिंदगी तो दुधारी है हीं, क्या करें ?

श्रद्धा जैन ने कहा…

Puri zindgi hi aapne kah di hai talkh bhi meethi bhi
sach zindgi ko kisi ek shabd mein baandhna mumkin hi nahi hai
bahut achhi rachna