कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 19 जून 2009

उदास राहों में जो घुंघरूओं से लेटे हैं - कुछ गीत गजल नुमा

उदास राहों में जो घुंघरूओं से लेटे हैं
छू दो तो बज उठेंगे ये सब हमारे बेटे हैं

उदास राहों में...

मरे नहीं हैं अभी गम खा के सोए हैं
जमाने भर का दुख अपनी बांह में समेटै हैं

उदास राहों में...

बिसूरते होंठ जो फट गए अभावों से
इन्‍हें मरहम भी न दें क्‍या हम इतना हेठें हैं

उदास राहों में...

2 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत है।बधाई।