कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 7 जून 2009

गीदड़ की बहादुरी - बाल कथा - कुमार मुकुल

एक बार गीदड़ों की एक बैठक चल रही थी। जंगल के अपने-अपने अनुभवों की सब बारी-बारी से चर्चा कर रहे थे। एक गीदड़ ने कहा, देखो मैं तो देखता रहता हूं। जब शेरनी अपने बच्चों के साथ पानी पीने नदी की ओर जाती है, तब मैं उसके शिकार पर हाथ मार लेता हूं’ दूसरे गीदड़ ने कहा, ‘मैं तो बस शाम होते ही जंगल से लगी झाड़ियों में दुबक जाता हूं। कोई-न-कोई खरगोश हाथ आ ही जाता है।’
इस बीच एक युवा गीदड़ अपनी पूंछ ऐंठता आया और बोला, ‘मुझे तो शेर मिले, तो उसे भी दूं एक पटखनी।’
‘क्या!’ सभी गीदड़ एक स्वर में बोले, ‘नहीं सच में! शेर से लड़ने के लिए किसी हथियार की जरूरत नहीं है। बस जरा अपनी आंखें लाल करनी है। जरा मूछों को कड़ा करना है और उस पर छलांग मारकर उसे दबोच लेना है।’
गीदड़ अपनी चालाकी का वर्णन अभी कर ही रहा था कि शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। दहाड़ सुनकर सभी गीदड़ भाग खड़े हुए। पर वह गीदड जो अपनी ताकत का बखान कर रहा था, वहीं खड़ा रहा। गीदड़ को रास्ते में अकड़ते देख शेर को बड़ा गुस्सा आया। उसने उसके पास जाकर जोर की दहाड़ लगीयी। तब गीदड़ ने भी अपना चेहरा कड़ा किया और दहाड़ने की कोशिश की। पर उसकी दहाड़ रोने में बदल गयी। शेर को उसकी हालत पर आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘यह क्या पागलपन है। भाग यहां से।’ फिर भी गीदड़ वहीं डटा रहा तो शेर ने उसे एक झापड़ रसीद किया। गीदड़ झाड़ियों में अपने साथियों के पास जा गिरा। वहां गीदड़ों ने उसे घेर लिया और कहा, ‘वाह! आखिर शेर से भिड़ ही गये। पर शेर ने तुमसे क्या कहा। वह दहाड़ क्यों रहा था?’
गीदड़ ने कहा, ‘वह धमका रहा था कि चल भाग यहां से। नहीं तो खुदा के पास पहुंचा दूंगा। पर मैंने भी डांटा कि अब जंगल में तुम्हारा राज ज्यादा नहीं चलने को।’
‘पर तुम रो क्यों रहे थे।’ बीच में एक गीदड़ ने पूछा। ‘मूर्ख मैं रो नहीं रहा था। इसी बीच उसने मुझे यहां फेंक दिया। नहीं तो बच्चू को आज मजा ही चखा देता।’ आगे उसने कहा, ‘अभी मेरी आंखें जरा लाल नहीं हुई थी और मूंछे थोड़ी और कड़ी करनी थी। फिर देखते कि कौन टिकता।’
तभी शेर उसी रास्ते से लौटता दिखा। उसे देख गीदड़ फिर उसके रास्ते मे आ गया। शेर ने कहा, ‘पागल हो गये हो। मरने का इरादा है।’ गीदड़ ने निर्भीकता से कहा, ‘नहीं मैं तो आपकी तरह आंखें लाल कर पंजे चौड़े करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि शिकार में आपकी कुछ मदद कर सकूं।’ ‘क्या शेर ने उस गीदड़ की गर्दन दबोच कर उसे ऊपर उछाल दिया। गीदड़ नीचे गिरा तो उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे।
इस घटना के बाद बूढ़े गीदड़ ने बाकी गीदड़ों को समझाया, ‘ज्यादा शेखी अच्छी बात नहीं। मैंने उसे कितना समझाया था कि तुम बहादुर हो, शेर से मुकाबले की जगह कोई और काम करो। हमलोग गीदड़ हैं, और गीदड़ शेर का शिकार नहीं करते। पर वह माना नहीं। बेचारा।’