कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 2 जून 2009

अमेरिकन – कहानी


लॉन के दरवाजे तक पहुंचा ही था कि भीतर वरांडे से आती उसकी तेज आवाज ने उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करा दी थी। लोहे की चौखटे के भीतर पांव डालते मैंने सोचा कि तीन साल अमेरिका में रहकर भी ससुरे की उंची आवाज में बात करने की आदत गयी नहीं ह। वहां किससे बात करता होगा वह, इस तरह । क्‍या अंग्रेजी में भी वह हिन्‍दी की तरह जोर जोर से चिल्‍लाकर बातें करता होगा वहां। यह सब सोचता बढा जा रहा था मैं कि दाहिने हाथ में मोबाइल थामे वह मेरी ओर लपका। मेरे पास पहुंचने के पहले उसकी मोबाइल बजने लगी थी। उसे कान से लगाता वह पास आया । मैं मिलाने को आगे बढाए अपने हाथ को उसके बाएं हाथ पर कलाई के उपर छूते हुए आगे कुर्सी की तरफ बढा। इस बीच मोबाइल कान से लगाने के पहले वह इतना ही बोल पाया था – क्‍या ... अमर। यह वही ध्‍वनि थी जो तीन साल पहले मुझे उससे मिलने पर सुननी पडती थी। तो तीन साल क्‍या अमेरिका में झक मारता रहा यह। कुछ भी नहीं बदला ससुरे का।
चेहरा थोडा जरूर लाल हो गया था और पैर कुछ ज्‍यादा गोरे हो गये थे पर सिर पर चांद वैसी ही बालों के झुटपुटे से झांकती सी थी। दरमियाने कद का था वह। मैंने अंदाज लगाया कि चेहरा जि‍स तरह भर रहा है यदि और भरा तो पकिया अमेरिकन लगने लगेगा यह पर अपनी कद का क्‍या करेगा यह।
अमेरिका में रह रही भारतीय लडकी से विवाह के बाद पहली बार वह भारत आया था अपने ससुर के मरने पर, उनकी अंत्‍येष्‍ठी में भाग लेने। इस बीच जब भी उसके पिता सुबह की सैर के वक्‍त मिलते मैं उसकी बाबत पूछ लेता कि कब आ रहा है वह...। अक्‍सर जवाब मिलता कि शायद अगले साल आए। एक बार पता चला कि उसकी बीबी तो आयी है पर वह अभी वहीं अपनी पढाई पूरी कर रहा है, जो वहां नौकरी के लिए उसे पूरी करनी थी।
अभी मोबाइल पर वह अपनी ससुराल में ही किसी को सास की बाबत सलाह दे रहा था- मोनू, तू समझाही हुनका, कि भारत में रहे के जिद छोडथिन, देशप्रेम निक छै पर ओतै ठीक इलाज होए छै त जा के इलाज काराएल जरूरी छै। नै नै ... एकदम नीक बात नै छै। एही जिद के चलैत एक गोटा के जान गैले अब इहो पा्ण दे दीथिन। अभी छोटकी के बिआहो करै के छै हुनका ... कि नै ...। आ ओकरो लेल उ भारतीय वर ढूंढै छथिन। मरै के बेर पैदा एहन देशप्रेम के की मतलब।
मोबाइल पर बात खत्‍म होते ही उसने पास बैठे पिता को वैसी ही सलाह देनी शुरू कर दी। कि वे भी आपनी बीस साल पुरानी पाइल्‍स को क्‍यों पोसे हुए हैं। उसने उन्‍हें निर्देश दिया कि कल वे जाकर आपरेशन के लिए बात करें। पैसा की चिन्‍ता छोडें। उसके पिता राज्‍य सरकार के बीस हजार पाने वाले कर्मचारी थे। वे मुस्‍कराते हुए उसकी बातें अपने सर के उपर से जाने दे रहे थे। उनकी मुस्‍कराहट को अपने लिए उत्‍साहजनक मान पास बैठे उनके मित्रों ने आखिर उन्‍हें समझा दिया कि पाइल्‍स का हल आपरेशन नहीं है। इसके बाद भी फिर से पाइल्‍स का खतरा बना रहता है। फिर आपरेशन के बाद कई लोगों को यह गडबडी हो जाती है कि व्‍यक्ति मलावेग महसूस नहीं कर पाता और देर होने पर बिना जानकारी के मल बाहर आ जाता है। वार्तालाप का पट्टाछेप उसकी इस जानकारी से हुआ कि अमेरिका में भी आयुर्वेद की दवाओं का महत्‍व बढ रहा है।
इसके बाद उसने अपने छोटे भाई विकट को पुकारा। एक अरसा पहले विकट बजरंग दल में रूचि रखा करता था। और उससे गांधी-गोडसे पर बहस भी होती थी। पर तब तक उसके भाई की अमेरिका में शादी नहीं हुयी थी। उस समय उसके दिमाग में भी हर समय देशप्रेम की डुगडुगी बजती रहती थी। पर शादी के बाद उस घर का ही हुलिया बदल गया। अब सायकिल पर बारह किलोमीटर चलकर सायंस कालेज जाकर पढने वाला विकट अब हीरो होंडा स्‍प्‍लेंडर पर चलने लगा था। अब वह काला फैंटमी चश्‍मा और आधुनिक टोपी चढाए पास से सरर से निकल जाया करता था। यूं संघ की काली टोपी में वह पहले भी कभी नहीं दिखा था।
तो अपनी उसी नयी मोटर सायकिल से गिरकर उसके हाथों में मोच आ गयी थी। तलहथी पूरी तरह छिल गयी थी। और कलाई सूज गयी थी। सियाराम ने विकट को बुलाकर डांट पिलायी कि देखो इसी लापरवाही के चलते पापा की जान गयी। जाओ जाकर एक्‍सरे करा लो ... इस तरह की लंबी सलाह पा विकट झल्‍ला गया। उसने भी चिल्‍लाकर कहा – भैया आप भी ...। अरे हेयर क्रैक भी रहता तो मैं क्‍या हाथ हिला पाता । मोच है तो अभी जा रहा हूं हलीम पहलवान से हड्डी बैठवा लेता हूं... उस ससुरे के यहां भी तो लाइन लगी रहती है। दो मिनट में ठीक कर देगा है वह ऐसी चोट मोच।
इस पर उसके पिता ने चोटों की तफसील लेते कहा कि हेयर क्रैक भी हुआ और हलीमा ने इधर उधर मल दिया तो लेने के देने पड जाएंगे। इस पर विकट ने तर्क दिया कि वह कंधे के उपर की नस खींच कर कलाई का दर्द उतार देता है। आप लोग झूठो कुछ का कुछ सोचने लगते हैं। अंत में बात इस पर खत्‍म हुयी कि वह हलीम के पस जाए और अगर वह कंधे की नस ठीक कर दर्द उतार दे तो ठीक है नहीं तो उसे सूजी कलाई मत छूने देना। सीधे जाकर एक्‍सरे करा लेना।
अब तक सियाराम जमीन पर पालथी मार बैठ चुका था। बैठ कर फर्श छूते उसने कहा – वहां ऐसा फर्श छूने को तरश जाता हूं। अमेरिका में बाथरूम तक में कालीन बिछा रखा है ससुरों ने। कभी कभी मन करता है कि सारा कुछ उखाड फेंकूं पर भाडे का मकान है – यही लाचारी है। एक दिन रिंग होने पर दरवाजा खोला तो दरबान ने मालिक की चेतावनी से अवगत कराया – आपके यहां हो हल्‍ला ज्‍यादा होता है। उसका मतलब बच्‍चों की चिल्‍ल पो से था। उसके जाने पर मैंने बच्‍चों को कहा कि – खूब हल्‍ला मचाओ ...। कि यह भी कोई बात हुयी कि यह स्‍वतंत्रता की मूर्ति वाला देश है और बच्‍चे कितनी जोर से चिल्‍लाएं यह मकान मालिक तय करेगा। इस पर रीटा चीखी मकान खाली करवाओगे क्‍या ...।
अब तक उसके पिता के दोनों मित्र जा चुके थे। इसके बाद उसे नार्मल होने और अमेरिका से बाहर आने में पंद्रह मिनट और लगे। इस बीच वह बेचैनी से कभी बाहर कभी भीतर मां को , भाई को कुछ कुछ निर्देश देता फिर रहा था। आखिर वह आकर पास वाली बेंत की कुरसी पर जम गया। मैंने उस वरांडे पर नजर डाली कि अमेरिका जाने के बाद क्‍या बदला है यहां तो कुर्सियां तो वही थीं बेंत की तीन। बाकी बांस की चांचर का गेट अब विशाल लौह द्वार में बदल चुका था। भीतर की लॉन अब सीमेंट से ढल चुकी थी। वरांडे पर तिरपाल के कपडे की चिक डाली जा चुकी थी। इसके उलट घर के बाहर की सडक बिखर कर इस तरह बरबाद हो चुकी थी कि केवल पैदल ही आया जा सकता था। बरसात में पानी लगने से ऐसा हुआ होगा। जैसे-जैसे खाली जमीन पर मकान बन रहे थे, सडकें बिखरती जा रही थीं। और यह अमेरिका नहीं बिहारी मुहल्‍ले का मामला था।
अब तक वह निश्चिंत हो तीन साल पहले की बैठकबाजी के लिए तैयार हो चुका था। आज शनिवार था उसके पास काम बेशुमार थे पर आज छुट्टी की वजह से उसे कहीं जाना नहीं था।
आजकल क्‍या हो रहा है से आरंभ किया उसने । मैंने बताया नही कि बेरोजगारी है – भारतीय मूल के अमेरिकन मां बाप द्वारा अपनी बेटी के लिए चुन लिए चुना लिया जाना कोई उपलब्धि तो नहीं थी पर उसके जो आर्थिक परिणाम थे वह तो उपलब्धि थे ही। वराना इंजीनियरिंग की पढाई के बाद भी एक दशक से वह बेरोजगार ही था और उसकी अच्‍छी भाषा को ध्‍यान में रख मैंने ही उसे पत्रकारिता की राह दिखायी थी। और अमेरिका के लिए दुल्‍हे के रूप में चुने जाने में मीडिया से मिले ग्‍लैमर की भूमिका तो थी ही। छोटी फीचर नुमा टिप्‍पणियां लिखिने से नवभारत टाइम्‍स से आरंभ कर टाइम्‍स इंडिया में आइएएस आइपीएस के साक्षात्‍कार लेने तक उसकी एक छवि बन ही गयी थी। हालांकि अमेरिका में भी वह कंम्‍प्‍यूटर की पढाई में महारत ही हासिल कर रहा था। इसके बाद कोई नौकरी मिलनी थी उसे। पर यह सब उसे मेरी तरह जीविका के लिए नहीं करना था।
पर मेरे पास भी एक उपलब्धि तो थी ही जिसकी मित्रता के कारण वह उपेक्षा भी नहीं कर सकता था । मैंने उसे बताया कि मेरा पहला ढंग का लेखों का संग्रह छप गया है इस साल और इस बार इसे मैंने अपने पैसे से नहीं छापा है। बल्कि प्रकाशक ने पहल कर इसे छापा है। और देश के सभी हिन्‍दी अखाबारों ने और एकाध अंग्रेजी अखबार ने भी उसकी प्रशंसा के पुल बांधे हैं। किताब मेरे पास थी, अखबार में लिपटी। जिसके बारे में पहले ही पूछ चुका था वह पर ऐसे ही – कुछ नहीं - कह मैंने उसका ध्‍यान बंटा दिया था तब।

किताब की बात सुनते ही उसने कहा कि वह उसे खरीद कर पढेगा – कि जाने के पहले मैं उसे याद दिला दूं – किस प्रकाशन से है किताब ...। फिर उसने जोडा अमेरिका में मुफत पढने का चलन नहीं है। मैंने बताया कि यहां बंगाल में भी लोग खरीद कर पढते हैं। मैंने मन में सोचा कि क्‍या तमाशा है – किताब मैं उसे भेंट करने आया था पर यहां तो अमेरिका भारत के चलन में उलझ गये हम ...।
क्‍या अमेरिका जाकर वह खरीददार में परिणत हो चुका है। मैंने इस पर कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद किताब दिखायी उसे। उलट पलट कर आराम से पढने की बात कर उसने किताब रख दी पास ही। मैंन जानता था वह भुलक्‍क्‍ड है और किताब खरीदने की आपनी जिद वह भूल जाएगा आखिरकार ...। तीन साल में एक भी चिट्ठी नही लिखी थी उसने। मैंने भी नहीं ।
अबतक भीतर से उसकी मां कई बार चिल्‍ला चुकी थी – कि सियाराम , मुंह धो लेही। ग्‍यारह बजलौ। अंत में वे ब्रश में पेस्‍ट लगा ले आयीं। ब्रश देखते ही भडका वह – मां पीछू से आम अमरूद के दातुन तोडवा लाही। उहां त दतवनों सपना भे जाए छे...।
फिर उसने बताना शुरू किया कि अमेरिका में अमरूद तो मिलता नहीं आसानी से। एक बार मेक्सिको से मंगाया था दो अमरूद तो उसके पांच डालर माने दौ सौ के उपर लग गये। उसका स्‍वाद भी गोबर जैसा था। उसने मां को आवाज लगाई कि – विकट के कही कि जाके बाजार से ताजा इलाहाबादी अमरूद ले आए।
उसने बताया कि वहां खाना इतना महंगा नहीं है। डेढ दौ सौ डालर में महीने भर खाया जा सकता है पर आम अमरूद के लिए वहां तरस जाना पडता है। - मिलता भी है तो वही ...।
मैंने देखा कि उसी गोरी बांह और लाल गालों पर तीखे लाल धब्‍बे उभर आए थे। बातों में पता चला कि वह ससुराल में कल जिद कर छत पर सो गया था। वहां मच्‍छरों ने यह हाल कर दिया। और ऐस कहते वह फिर अमेरिका का रोना रोने लगा। वहां तो छत भी नसीब नहीं। एक तो डायनासोरों सी उंची बिल्डिंगें दूसरे सबकी छतें ढलवां कि बर्फ गिरे तो टिके नहीं ...।
और हां इनकम टैक्‍स चौराहे पर लिट्टी भी खानी है। मुझे याद आया कि किस तरह यहां गुमटी पर की आधा दर्जन लिट्टी वह देखते-देखते गडप कर जाता था। वहां क्‍या करता होगा यह...।
तब तक वह शुरू हो चुका था। अरे वहां जाकर रेस्‍तरां में पूछता तो खाक कोई खाने की सामग्री मिलती – पर ऐसा तो है नहीं कि चना गेहूं वहां नहीं मिलता। हां कैसे क्‍या पकाना है वह रोस्‍तरां वाले को बताना होता था- मेरे छुट्टी के दिन वे बिना आर्डर के ही लिट्टियां बना मेरा इंतजार करते थे।
फिर पढने- लिखने की बात चली , तुमने तो एक भी खत नहीं डाला यार ... मैं चुप रहा । कुछ पढने को तरस जाता था वहां। कुछ हिन्‍दुस्‍तानी नेट पर अगडम बगडम छापते रहते हैं पर उससे मन भरे तब ना। मैंने विकट को लिखा था कि अमर भाई से पूछकर कुछ किताबें भेजना। पर मेरे अमेरिका जाने के बाद मुझसे ज्‍यादा अमेरिकन तो यह विकट हो चुका है। उसने बाजार जाकर साहित्‍य अकादमी प्राप्‍त दो किताबें मुझे भेज दीं। यार क्‍या कहूं – मेरे तो कुछ पल्‍ले नहीं पडीं।
पहले तो मैं चक्‍कर में पड गया कि अमेरिका आकर क्‍या मेरी औसत बुद्धि कम हो गयी है कि साहित्‍य अकादमी प्राप्‍त किताब इतना बोर कर रही है। फिर सोचा बस छह माह में ऐसा कैसे हो जाएगा ...।
मैंने पूछा कि कौन सी किताबें थीं वो ..। तो उसने बताया कि एक तो किसी शुक्‍ल जी की थी – उपन्‍यास। कुछ खुलेगा तो देखेंगे टाइप। और दूसरी तो अपने शहर के ही कविवर तरूण जी की पुस्‍तक थी। यार मैं तो चट गया पूरा।
मैं हंसा – हां अमेरिका के हिसाब से थोडी टफ थीं किताबें – और वहां तो पढने का उद्देश्‍य भी बदल गया होगा तुम्‍हारा – जिज्ञास की जगह अब मनोरंजन ने ले लिया होगा ...। नहीं यार – शुक्‍ल जी की एक और किताब पढी थी पहले – तुम्ही से लेकर तो । हां वह नौकर की कमीज। शुरू में कुछ बोर होने के बाद वह किताब पढा ले गयी थी अंत तक। पर यह खुलेगा तो अंत तक खुला ही नहीं । मैंने उसे सुधारा – खुलेगा नहीं खिलेगा ...।

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