मंगलवार, 26 मई 2009

यतीमी की एक रात - कहानी


चांद एक कांइया कुत्‍ते की तरह मेरे पीछे पडा था। और मेरी आत्‍मा की रोटी पर झपाटे मार रहा था। मैं चिंथा जा रहा था। यह यतीमी की एक रात थी, जो लैम्‍पपोस्‍टों के तीखे प्रकाश में हनुमान मंदिर के अहाते में बीत रही थी। यह विवेकानंद और सुभाष का समय नहीं था जब भागने के लिए पूरी जमीन होती थी, जंगल होते थे, सूने पार्क और सूनी स‍डकें होती थीं। नदियों के कछार, पेड, पहाड होते थे। ...सब अभयारण्‍य बन चुके हैं। अब कंकरीट के जंगल में लोग पत्‍तों की तरह भरे पडे हैं। एक दूसरे के हिस्‍से की धूप खाते लोग। अपनी अपनी पीडाओं की काई पर पछाड खाते लोग। पर उस छण युग की चिंताओं से बडी हो गयी थीं अस्तित्‍वहीनता की पीडाएं और पहले मैं लडा था,पर जमीन अपनी नहीं होने की नैतिकता में घर छोड दिया था मैंने।
तुम मेरे टुकडों पर पलते हो- यही कहा होगा पिता ने। समझा रहे थे आलोक दो। हर बाप यही कहता है। जाओ, उससे कहो कि यह शरीर भी उसका है। ओर इस उप-उत्‍पादन को तुम्‍हारे आनंद ने नहीं समय की दुश्चिंताओं ने पाला है। लौट जाओ-यह शरतचन्‍द्र के देवदास का युग नहीं। तुम्‍हारी उम्र तेरह-चौदह की नहीं। तुम अकेले भी नहीं। तुम्‍हारी पत्‍नी है। और किसी के लिए नहीं तो अपनी सहकर्मिणी की पीडाओं के लिए लौट जाओ।

यह जानते हुए भी कि अभी मैं लौट नहीं पाउंगा। मैंने उन्‍हें लौटने का विश्‍वास दिलाया और स्‍टेशन आ गया। यूं अपनी कल्‍पनाओं में ते मैं लौट ही चुका था। इस लौटान ने मुझे थकाना शुरू कर दिया था। पास कुछ रूपये थे तो सोचा कि किसी होटल में कमरा ले लूं। पर इस तरह रूपये जाया करना ठीक नहीं लगा। मैं इधर उधर टहलने लगा। कई बार का देखा प्‍लेटफार्म आज बदला बदला सा लग रहा था। शायद एक घर और बिस्‍तर की गुंजाइश वहां ढूंढने की वजह से ऐसा हो रहा था। आज विश्‍वकर्मा पूजा थी। रेलवे स्‍टेशन के अहाते में भी एक मूर्ति थी। वहां भंगियों और कुलियों के लडके डिस्‍को-भांगडा कर रहे थे। एक मुस्लिम युवक भी सा‍थ साथ ताल दे रहा था। कुछ देर मैं नाच देखता रहा, साथ इधर उधर भी देख लेता कि जेब ना कट जाए।
तभी उधर से कुछ सादे कुछ वर्दी में पुलिस वाले गुजरे। उनमें एक ने नाचते लौंडे पर सिक्‍के फेंके, जिनमें कुछ भगवान के चरणों में जा गिरे। फिर एक मिलिट्रीमेन आया और तटस्‍थ भाव से सिर झुका कर चल गया।
अब मैं आगे बढा। ए.एच.व्‍हीलर की दुकान के आगे काफी लोग सो रहे थे। पर वहां उमस थी। बाहर छोटे से पार्क में लोग बिखरे बिखरे सो रहे थे। मैंने सोचा कि सोया जाए यहीं फिर मच्‍छरों का ख्‍याल कर मैं मंदिर की ओर बढ गया। भूख लग रही थी। नमरी के सिवा पांच-सात रूपये खुदरा थे। सोचा इतने में घर लौट जाना है। सो तीन रूपये के दो उबले अंडे खाए, बगल की चाट की दुकान से पानी पीया और मंदिर के हाते में बने सीढीनुमा बैठके पर बैठ गया। आहाते में लोग ठुंसे सो रहे थे।

कुछ देर बाद अधेड खिचडी चेहरे वाला एक व्‍यक्ति मेरे पास चुके मुके बैठ गया। फिर बोला – यहां नींद कैसे आ जाती है...। वह मेरी ही ओर मुखातिब था। तो मैंने कहा – हां , कष्‍ट है , पर लोग सो ही लेते हैं। उसके वक्‍तव्‍य की प्रासंगिकता पर मुझे संदेह हुआ, कि कहीं पाकेटमार तो नहीं। तब तक बंदरों की तरह उछलता वह दूसरी ओर बढ गया। तब पीछे बैठा व्‍यक्ति बोला – देख रहे हैं वह बूढा केवल नौजवानों से बतिया रहा है। बात मेरी समझ में नहीं आयी। उसने फिर कहा – अरे , दलाल है, साले नींद की चिंता करते हैं। यह रात भर यूं ही घूमता पटठे फंसाता फिरेगा।
मैं थका था। नींद तेजी से आ रही थी। पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। इसीलिए वह बूढा मुझे करूणा का प्रतीक लग रहा था।
मंदिर की रात्री डयूटी का सिपाही लाठी फटकारता घूम रहा था। साढे ग्‍यारह बज रहे थे। मंदिर के पट बंद होने का समय हो चला था। घंटे- घडियाल के साथ आख्रिरी अरदास शुरू हुयी। पहले बडा पट धीरे धीरे बंद हुआ । फिर छोटा पट औंर अंत में कम्‍प्‍यूटर चालित तुलसी के दोहों का लिखा जाता लाल पट भी काला पड गया। और भगवान सो गए। अब पहरेदार ने बेंत से कोंच कर कुछ फटेहाल लोगों को उठाना शुरू किया। जा भाग- भाग प्‍लेटफार्म पर। ये पाकेटमार व अन्‍य धंधेबाज थे। हो सकता है खुद को जगाने की डयूटी वे इस पहरूए को दे गए हों। फिर वह पहरेदार पास आकर बोला आप क्‍यों बैठे हैं...। जगह नहीं मिल रही क्‍या ...। देखिए सोए आदमी के बगल में बैठना अपराध है। जाइए आप लोग तो शरीफ आदमी हैं,आप ही सब के लिए तो जगह खाली करायी है। उधर लेट जाइए। मैं उठता तब-तक वह आगे बढ गया। आस पास चर्चा छिड गयी कि ऐसा वैसा कोई कानून है भी या नहीं। तय हुआ कि कानून है, पर क्‍या हम चोर हैं, उन्‍हीं ससुरों के चलते तो रतजगी कर रहे हैं। तभी कोई चिल्‍ला उठा – चोर, चोर। भगदड मच गयी। काफी लोग जग गए। कोई भागता सडक पर पकडा गया। एक काला बूढा अधनंगा आदमी था, चप्‍प्‍ल चुराता पकडा गया था। भगदड में खाली जगह देख मैं लेट गया। अपना छोटा सा हैंड बैग सर के नीचे रख सोने की कोशिश करने लगा। संगमरमरी स्‍लेट पर आध घंटे सोने के बाद थकान मिट गई, और नींद खुल गयी। सामने खंबे की ओट से चांद उपर आ रहा था। उसकी गति काफी धीमी लग रही थी, मानो मुझ पर निगाह रखे हो। आजिज आकर मैं घर से भागने की स्थितियों पर विचार करने लगा। तमाम घटनाओं के अक्‍श चांद में उभरने लगे। पिता,बहन,बहनोई,भाई, मां और मैं। चीखते-चिल्‍लाते सब। सबके उपर चिचियाता मैं। ओह कैसी आदिम-‍इयत थी। क्रोध में मैंने मां-पिता को धक्‍का दे दिया था।ओह , मेरे हाथ सलामत हैं, किसी का भी शाप नहीं लगा मुझे। श्राप नहीं लगा करते कलयुग में। कैसे हतप्रभ थे पिता , मेरी वाचालता , मेरी उदंडता पर। पूजा से उठे वे अगरबत्‍ती दिखा रहे थे और उबल पडा था मैं। उनके पवित्रतम क्षणों में मैंने यह भददी हरकत की थी। अवश, अवाक थे वो। उनकी आंखों में चढता रक्‍त उनकी नजर को धुंधला कर रहा था। अपने उग्रतम क्षणों में कितने निरीह थे वो।
पर वर्षों से हो रहा मेरा मानसिक उत्‍पीडन। जाने कब से मैं खुद को यतीम, टुअर समझने लगा था। ऐसे में मेरे वो उन्‍मुक्‍त ठहाके और उन्‍हें नम करता पडोस के चाचा जी का वात्‍सल्‍य। और चाची मां। कभी बेटा तो नहीं कहा- पर उन्‍हें देख सदा मैं बछडे सा हुमकात था। और उनकी सजल आंखों में गाय की पूंछ हिलने लगती थी। फिर मोनू की छोटी सच्‍ची जिदें, गोलू की मुझे परखती चुप्‍पी, बबली का बेधडक मेरा स्‍क्रू ढीला बतलाना और गुडिया का कुछ करने की उमंग में आधी बातें भीतर ही रख लेना। तो क्‍या अपने अनाथाश्रम के मालिकों की खातिर अपने माता , पिता , भाई-बहनों की इस दूसरी दुनिया का त्‍याग कर दूं मैं।
पर पता नहीं क्‍यों इन और ऐसी तमाम पीडाओं का वजूद पिता की आंखों की अवशता के आगे कांपने लगता है। पिता-पिता-पिता:पुत्र-पुत्र-पुत्र , एक बीज वृक्ष। अपना हृदय खोलो पिता, फैलाओ उसे कि अंकुर फेंक सकूं मैं। अचानक क्रम भंग हुआ। मैं उठा और टिकट काउंटर की ओर बढा कि प्‍लेटफार्म टिकट ले दो घंटे भीतर टहल सकूं। प दो बज गए थे और वह बंद हो चुका था। कोई गाडी नहीं थी। व्‍हीलर की दुकान बंद हो चुकी थी। उसके आगे किताबें पसार एक व्‍यक्ति बैठा था। भकोसे सी सूरतें लिए कुछ औरतें अपनी नींद के खरीददारों के साथ अंदर-बाहर कर रही थीं। मैं लौट गया। मेरी जगह खाली थी। चार बजे मैं जगा और टेम्‍पो की खोज में टहलने लगा। पांच बजे तक टहलता रहा। तब टेम्‍पो मिला। अंधेरा छंट रहा था। सोचा इतना सबेरे घर पहुंचना ठीक नहीं। लोग सोचेंगे, जैसे तैसे रात काट भागा आ रहा है। सो बीच में चिडियाखाने पर ही उतर आया। भीतर काफी लोग टहल रहे थे।, लडके जागिंग कर रहे थे। एक बेंच पर बैठ गया मैं। किरणें फूट रही थीं। और अंधकार वृक्षों की शरण ले रहा था। आखिर वह पत्‍तों में सिमटता गया और मैं आगे बढता रहा। पोलो के मैदान में बच्‍चे फुटबाल खेल रहे थे। खेलने का जी हुआ मेरा भी पर आगे बढ गया मैं। एक युवक हिरणी को घास खिला रहा था। मैंने भी उसकी पीठ सहलाई फिर घास उखाडकर खिलाया। छूछे सहलाना उसे रास नहीं आ रहा था। फिर सडक पर आया मैं। एक आश्‍वासन की तरह सूर्य मेरी पीठ पर उग रहा था। घर के निकट पार्क में पिता टहल रहे थे। वो मेरी ही ओर आ रहे थे। मैंने सोचा- कुछ बोलेंगे तो चुप-चाप लौट जाउंगा। फिर उनका अवश चेहरा याद आया। अब वे पास आचुके थे। नजरें मिलीं , वे रूके और बोले- कहां चले गए थे। मेरी आंखों में आंसू उबल पडे। चुप-चाप साथ हो गया मैं। पिता ने तमाम बातें कहीं- मैं चुप रहा। घर पास आ रहा था। पडोसी सोच रहे होंगे। पिता हमें ढूंढ कर ला रहे हैं। मैं सोच रहा था- पिता खो गए थे, खो गया था उनका वात्‍सल्‍य। क्‍या मां को भी इसी तरह खोज सकूंगा मैं। और बहनों को भी।
सामने की छत पर पडोसन हमारे भाग जाने की खुशी और जल्‍दी लौट आने का गम छुपाती तटस्‍थता दिखा रही थी। मेरा युवा पडोसी बगलें झांक रहा है- मैं उससे पूछता हूं, क्‍या हाल है...। घर पर सब मुस्‍करा रहे थे। मैं सीधा शयन कक्ष पहुंचा- पत्‍नी रो रही थी। मिले-पूछा पेखी हुयी। बराबर हो हम हमाम पहुंचे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। नहा खाकर सो गया मैं। पीठ पर धूप पडी तो एंठिया लेता तरनाता जगा , जैसे पालने में सोया होउं।

कहानी द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित हो चुकी है