कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 7 मई 2009

आतंक

आतंक के
पांव नही होते
या तो वह
हवाओं पे सवारी गांठता है
या
भयाक्रांत स्त्री पुरुषों की पीठ पे।

3 टिप्‍पणियां:

mahashakti ने कहा…

बिल्‍कुल सही लिखा है

संध्या आर्य ने कहा…

bahut hee khubsoorat kawita ........sahee hai aatank aisa hi hai kuchh........bahut bahut dhnyabaad

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बेहतरीन!