रविवार, 31 मई 2009

औरत सगी नहीं होती – कहानी

छत पर पडी फोल्डिंग खटिया पर बैठा मैं उडती पतंगों और डूबते सूर्य का नज्‍जारा कर रहा था कि ठक-ठक जूते बजाते भाई साहब सामने आ खडे हुए। एक ओर होते हुए मैंने कहा – आइए बैठिए।
ना ना तैने बैठ। अपन इधर खडे ही ठीक हैंगा। ऐसा कहते वो कमर तक उठी दीवाल से टिक गए। और हाथ जोड लिए – कि भाई साहब आप तो समझदार आदमी होवो। मन्‍ने इ कहनो हे कि आप तो पढे-लिखे आदमी हो। तो लौंडों सौंडों से मन्‍ने बात करनौं अच्‍छा नै लागो हो।
तन्‍ने मन ए मन गाली तो नै दे रहयो ... कि पीछे पड गयो एकदम। नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, सुनाइए आप – बोलता हूं मैं। अब उन्‍होंने अपनी सीधी तर्जनी दिखाते कहा – कि मन्‍नू यूं आदमी होवो...।
फिर उंगली को पोरों से मोडते हुए कहा – यूं ना होवो ... एकदम सीधा यूं आदमी होवो। अरे क्‍या बात है ... एकदम ठीक ... आगे बताइए। सब ठीक तो है न ...।
तो बताउं भाई साहब ... मन्‍ने ग्‍यारह भाई होवैं, सगे ग्‍यारह। और सब एक साथ हवें ... यहां तो हमार कुछो ना हौ, पर उहां कस्‍बे में देखौगे तो कहौगे कि – मन्‍ने वो आदमी ना हौ जो तन्‍ने नजर आवौ हौ – इ पचास गज की खोली वालौ ...।
मन्‍ने तो यहे सिधांत हवौ कि भाई – भाई मिल कर रहो – उंगलियों को एक दूसरे में फंसाकर दिखाते हुए बताते हैं , भाई साहब। यूं एक साथ रहनो सो ताकत हवौ हो... ताकत।
हां हां एकता में बल है ... आगे बताइए... बल वल नई भाई साहब – खून खून हवौ, अपना खून – सारो महल्‍लो में घूम जावौ, भाई भाई में यूं रहौ हौ – कहकर वे अंगुलियों से क्रास बना कर दिखाते हैं। पर हम ग्‍यारह तौ ग्‍यारहौ के लिए जान दै दैवौं ... जान। भाई साहब, बुरा तो ने नी लागौ हौ ... नहीं नहीं , बोलते जाइए आप... तौ हम कहौ रहौ कि ... घर के इज्‍जत घर के इज्‍ज्‍त होवौ ... कोई इधर कौ दखौ तौ हम ओकर आंख निकाल लैवौ, आंख ... अंगुलियों से अंकुश बनाते हुए दिखाते हैं वो ।
एकदम – एकदम , उनकी भयंकर मुद्रा देख सकपकाता हुआ मैं बोला। भाई साहब तो सोचौ होगौ के इ रोज पी कै ऐसौ ही बक बक करतौ हौ ... पर मन्‍ने कहनौ हौ कै ... पी कै हम दंगा तौ नै करत हौ। अब देखौ , सोचनौ कौ इ बात हवौ जे अगर मान लौ कि मन्‍ने ... तन्‍ने से झगडौ करौ ... मान लौ कि ... गलती आपैके होवौ पर लोग कि कहौंगौ ... मन्‍ने लोग तौ कहौंगौ इहै कै इहै बदमाश हवौ, पी कै दंगा मचावौ हौ। पर तैं तौ देखत हौ ... मन्‍ने रोज एक अद्धा लेत हौ पर कभी किसी सों झगडा ना कियौ। नहीं नहीं आप तो भले आदमी हैं ... आगे कहिए तौ मन्‍ने कहौ रहयौ थौ कि भाई से बढकर कोऔ सगा ना होवौ। ... आर एक बात और ... इस ससुरी औरत जे होवे हौ, से कभी सगी ना हावे हौ। ... वौ तो चाहे हौ के भाई भाई में इन्‍ने रहयौ ... वो अंगुलियों से क्रास बनाते हैं। पर मन्‍ने इ एकदम बर्दाश्‍त ना होवै हौ। मन्‍ने हम नै रहयौ तो इ मेरो भाई के कहयौ ... माई-बापो के नै पूछौ हौ ... ता हमौ एकरौ के सीधा कर देलयौ ... मन्‍ने बोल दियौ ... भाई के खिलाफ सोच्‍चो भी ना तो .. उधेड के रख दियौ ... उधेड कै। तन्‍ने अपना मेहर कै बहोत मानै हौ। नहीं नहीं ... मुझे लगा कि मुझसे अपराध हो गया हो कोई ... अरे ठीक हौ ... मन्‍ने तन्‍ने से कोई मतलब ना हवौ, कि तन्‍ने की कै हौ ... मन्‍ने तौ अपन बात कहौ हवै के औरत कभी सगी ना होवै ... कभी ना... मेरौ बाबा एगौ किस्‍सा सुनायौ रहौ। हमरो गांव में एक ब्राह्मण-ब्राह्मणी रहौ। बराहमन मनै समझौ कि नै ... ओहै पंडी जी ... पूजा उजा करवै वला। तो दूनों में लाग लग्‍यो ... लग मनै समझौ कि नै ... अपनी अंगुलियां फंसा कर दिखाते हैं वे। हौं तो दूनौ एकै गांव कै रहयौ पवर इशिक तौ आंधर हावै हौ ... से दूनौ जहां मिलै ... लपटा जाए खेत-खलिहान-बाग-बगइचा ... गांव भर में थू थू होवै लाग्‍यो तो अंत में पंडी नै ओहरौ ब्‍याह देल्‍यो।
पर तौं तो जानै हौ कि लाग लग्‍यो तौ फेर छुट्यो नै। सौ कोनो नै कोनो बहाना करि ब्राह्मणी अपना मैके चली जावै... धीरे धीरे ओकरो खसम कै ई बात पता लग्‍यो। पहिलै तो वौ वौ कौ खूब समझैयौ, फेर मार पीट करयौ। पै इ सब सौ जौ कोनौ असर नै हयौ तौ एक रात वो अपना बीबी कै यार कै कटवा दीज्‍यौ। ब्राह्मणी समझौ कि इ कवनो चोर बटमार के करतूत हयौ। दू-चार दिन रो रा कै वौ शांत भ गेल्‍यौ। फेर लंबो अरिसौ बीती गेल्‍यौ। दूनौ बूढा-बूढी भा गयौ। एक दिन बूढा अपन भैंस दूहै रहौ – ता भैंस के पांव से लागी बाल्‍टी उलट गयौ – बस बूढा के गुस्‍सा आयौ, आर गारी देत उ बोल्‍यौ – ससुरी सीधी रहयौ ना तो वों ही काटि देबौ जेना बीबी के यार के काटिलौ रहिनौ। फेर त बुढिया इ सुनि लेल्‍यो – फेर त वौ घर के कोनाटी सौं फरसा उठेले आयौ आरि मारी दियौ ... खचाक ...।
सो मन्‍ने इ कहनौ हौ कै औरत कभी सगी ना होव्‍यौ ...।

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