कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 17 मई 2009

मेरे संगी कलाकार की दीवार कला - कुमार मुकुल



मेरे साथ वाले कमरे में मेरे युवा साथी केशव भारद्वाज रहते हैं। दुनिया को ठीक करने का इरादा अपने मनमौजीपने के साथ लिए वे हमेशा चीजों को व जीवन स्थितियों को बदलने की जुगत में भिडे दिखते हैं। उन्‍होंने पत्रकारिता की पढाई की है बीच में एमबीए करने मदुरई चले गए थे फिर वह पढाई बीच में ही छोड दिया। एक लडकी से उनकी दोस्‍ती हो गयी और जब थोडी परवान चढी तो एमबीए के साथियों के बीच ही वे अनजाने से लगने लगे अंतत: अपनी पढाई बीच में छोड वे दिल्‍ली वापिस आ गए। लडकी से उनके संबंध गहरा गए थे तो लिहाजा उन्‍होंने कोशिश की कि साथ बना रहे, थोडी ना नुकुर के बाद अपने घरवालों को तो उन्‍होंने मना लिया पर दूसरी जाति की लडकी के घरवालों को नहीं मना पाए। लडकी में खुद अपने निर्णय लेने का माददा नहीं था। सो रो धोकर फिर दुनियावी कामों में लग चुके हैं।
आजकल वो कैट की तैयारी में जुटे हैं। साहित्‍य की पुस्‍तकें भी पढते रहते हैं। पॉल कोहियो की चर्चित पुस्‍तक द अलकेमिस्‍ट को वे अपनी गीता बताते हैं। पॉल की ही दूसरी पुस्‍तक द विच ऑफ पोर्टोबेलो अरूणा ने मुझे पढने को दी तो मैं उसे उलट-पुलट पाता तब तक वे उसे पढ चुके थे। वे आवेग त्‍वरा में तुरत चीजों को इधर-उधर कर डालते हैं, पर इस सब के बीच दरअसल वे अपनी सही राह की तलाश में हैं और चलना ही मंजिल है इस निष्‍कर्ष पर पहुंचने वाले हैं , शायद।
उपर बना चित्र मेरे साथ वाले अपने कमरे में उन्‍होंने बनाया। पहले पेंसिल से दीवार पर गुंबद के पास खडी लडकी का चित्र बनाया उन्‍होंने,फिर दाएं एक कुंआ बनाया उस पर मोर बिठाया अगले दिन , अगले सप्‍ताह चारकोल ले आए बगल के धोबी के यहां से मांगकर और उपर एक मोर बना डाला। रात दायी दीवार पर कृष्‍ण बना डाला।
सुबह दस बजे तक सोए थे तो आभा के फोन से जगे वे। मेरा एमटीएनएल का फोन नहीं लगा होगा तो आभा ने जगा दिया होगा उन्‍हें। तो मैंने पूछा कि यार चाय वाय पी जाए उठिए। तो बताया उन्‍होंने कि मौसा रात चार बजे यह कृष्‍ण बना डाला मैंने , जगा रहा इसलिए सो रहा था इतनी देर तक। आज एक दीवार पर बने राधा और मोर के चित्र को उन्‍होंने फोटोशॉप में रंग कर अपनेब्‍लॉग पर डाल दिया। बहुत सी कलाकारियां हैं केशव में और एक दीवानगी भी। मैं तो कहता हूं कि मूलत: आप कलाकार हैं पर वे हैं कि प्रबंधन की गडबडियों से खफा अच्‍छा मैनेजर बनना चाहते हैं और पढाई से उब कर दीवार पर रेखाएं खींचने लगते हैं। हाथ सधा है सो बना जाते हैं अच्‍छी कृतियां। मैं भी कुछ कुछ बनाता रहता हूं तो मुझे भी सलाह दी कि अपनी दीवार रंग दीजिए। मकान मालिक बिगडेगा तो जाते समय मकान रंगवा देंगे फिर से।
थोडे मूडी हैं केशव । कभी अचानक मुंह बनाकर चुपचाप बैठ जाएंगे अकेले से, तब मैं भी उन्‍हें नहीं टोकता एकाध दिन बाद वे ठीक हो जाते हैं खुद । और रात बारह बजे अचानक कहेंगे चलिए मौसा घूमने चलते हैं हल्‍की बूंदा बांदी हुयी है मौसम ठंडा है कितना। मैं एक नींद लेकर उठा होता हूं , सो भगुंआया रहता हूं तो फिर बोलते है चलिए आइसक्रीम खायी जाए। फिर मैं भी उठकर चल पडता हूं तो रात में बउआते संजय वन तक चले जाते हैं हमलोग । मै कहता हं अरे यार अब उधर अंधेरे में कहा जाना है तो लौट पडते हैं।
कभी उन्‍हें मैथ पढने का दौरा पडता है तो एक ब्‍लाग बना उस पर मैथ की उलझने सुलझाने लगते हैं। अंग्रेजी में वोकोबलरी दुरूस्‍त करनी होती है तो उसके लिए एक ब्‍लाग बना लेते हैं। कुल मिलाकर एक जीवंत और झक्‍की व्‍यक्तित्‍व है उनका। अपनी सच्‍ची जिदों को आकार देने से उन्‍हें कोई रोक नहीं पाता। और यह अच्‍छी बात है...

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