कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 8 मई 2009

वीराने अब बुला रहे हैं

संकट अब तो घुमड़ रहे हैं

पितृसत्ता के सांड

चतुर्दिक विचार रहे हैं

परम्परा की अंकशायिनी

दुर्बुधि की अमरलताएँ

लहलहा रही हैं

सच्ची वारिस कहा रही हैं

पांव तले की धरती

अब तो दलदल में

बादल रही है

सर पे का आकाश

औंधे गिरने को मचल रहा है

वीराने अब बुला रहे हैं

चलें वहीँ अब तम्बू तानें ।

1 टिप्पणी:

नज़र ने कहा…

वास्तविकता के पटल पर खड़ा आइना है यह रचना