सोमवार, 27 अप्रैल 2009

जब उसने बस में ही बच्‍चे को जन्‍म दे दिया - भीम काका के बहाने

क्रिकेट की भाषा में कहा जाए तो भीम काका हरफनमौला चरित्र थे कोई काम कठिन लग रहा हो तो हम उन्‍हें ही याद करते थे। मेरे पिता सहरसा जिला स्‍कूल में प्रिंसिपल थे और हम साल में गर्मी की छुट्टी में एक बार एक महीने के लिए गांव जाते थे। तब लौटते में हमारे साथ अनाज के दस पंद्रह बोरे होते थे तब अगर चाचा हमें छोडने नहीं जाते तो वह उतना सामान ले जाने की कल्‍पना ही नहीं कर पाते हम। पढाई क्‍या की थी उन्‍होंने पता नहीं , गांव के कैलाश तिवारी पहले से मिलिट्री में थे तो उन्‍हीं के साथ भाग कर मिलिट्री में बहाल हुए थे वे। हर समस्‍या का हल ढूंढने की विलक्षण क्षमता थी उनमें। वह हल अक्‍सर न्‍यायपूर्ण होता कभी कुछ उटपटांग भी होता पर उनकी बुद्धी की दाद तो देनी ही पडती थी।
एक बार जब हमलोग गांव से अनाज के बोरे लाद कर घर जा रहे थे तो पडोस के गांव अखगांव से एक गर्भवती महिला भी चढी दर्द से एंठती और चांदी बाजार पहुंचते ना पहुंचते बस के धचके उसने बस में ही बच्‍चे को जन्‍म दे दिया। संयोग से उसने मेरे ही अनाज से भरे एक बोरे पर बच्‍चे को जन्‍म दिया था। उसे तो वही उतार दिया गया पर बोरा बुरी तर खूनमखून हो चुका था। हालांकि वह प्‍लास्टिक कोटेड था सो भीतर गंदगी नहीं गयी थी पर स्‍वाभाविक तौर पर मां नाक दाबे इधर उधर भागने लगी थी। पर चाचा जो खेती बारी करते थे वह मां के नाक दाबने से मिहनत से हुयी उपज को कैसे नष्‍ट कर देते। सो पटना जंक्‍शन पर उन्‍होंने इसका हल निकाल लिया और उसे लेजाकर पास के होटल में बेच डाला। पूछने पर दुकान वाले को उनका जवाब था कि मछली की भीगी टोकरी किसी ने रख दी थी बोरे पर।
चाचा जबतक सहरसा रहते हम उनके आगे पीछे लगे रहते। तीन चार दिन बार उन्‍हें जाना होता तो हम रोने लगते । वह आदत आज भी गयी नहीं है किसी अपने से अनिच्‍छापूर्वक दूर होते वक्‍त आज भी आंखें भीग जाती हैं। ट्रेन में छोडते जाते वक्‍त कभी कभी साथ विनय भैया भी होते सांवले मछोले कद के गठीले वदन के,उनकी बांह की मछलियां आज भी खींचती हैं हमें। अक्‍सर वे अपनी पीठ पर हमें टहलने को कहते ,हम संतुलन साधते उनका बदन दबाते रहते यह आदत अब मुझे लग गयी है छोटे बेटे को बारह साल का है अक्‍सर मैं पीठ पर चलने को कहता हूं वह पीठ पर रहता है और मैं किताब उलटता रहता हूं। जब बेटा छोटा था तब उसे मेरी पीठ पर चलना मजेदार लगता था, क्‍यों कि उस समय जीवन जगत के उसके तमाम सवालों का जवाब भी मैं देता चलता था।
तो जब चाचा और भैया जब हमलोगों के साथ होते तो हम दुनिया में किसी को गदानते ही थे कुछ। चाचा गोरे लंबे सोंटा जैसी देह वाले जवान और बडी मूंछों वाले मुझसे दस साल बडे चाचा के लडके विनय भैया। दोनों जने अपने कंधे पर एक एक तौलिया रखे रहते।

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