कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

नदी - कुमार मुकुल

अरसा बाद
मिल रहा था उससे
मेरा वर्तमान कांप रहा था
उसकी आंखों में
गहराइयां
खींच रही थीं उसकी
सो
उतरता चला गया
ठेहुने-कमर-कंधे
और अब
गले लग रहा था उसके

अंत में
सांसें रोक
डुबकियां लगा दी मैंने।

नदी - दो

उतरना तो मैं
उसके वर्तमान में
चाह रहा था
पर
बार - बार
चला जा रहा था
स्‍मृतियों में उसकी
परेशान हो
अपनी जमीन
खींच ले रही थी वह
बार-बार
मैं संभलता
फिर बहने लगता
अतीत की रौ में
आखिर
एक ज्‍वार आया
और उब-चूब होने लगा मैं
सांसें
फूलने लगीं
और अब वर्तमान ही वर्तमान था
भिगोता
रग-रग।

1 टिप्पणी:

ओम आर्य ने कहा…

डूबा दिया आपने अपनी नदी में !