कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 22 मार्च 2009

अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा - कुमार मुकुल

डायरी : 26 - 2 - 1995 - पटना
आज चाचा ने डायरी दी है। नयी डायरी पाकर मुझे खुशी होती है। पर जब सोचता हूं कि इसमें क्‍या लिखूं तो पता नहीं चलता ...। क्‍या लिखूं...। एक नई कविता लिखने की ईच्‍छा होती है पर कविता तुरत, कैसे लिखी जाए। पिछली बार चाचा से डायरी मांगी थी तो उन्‍होंने खरीद कर दी थी। इस बार लगता है पहले से व्‍यवस्‍था कर रखी थी। मैं एक अखबार का संपादकीय रोज लिखता हूं पर मुझे डायरी देने वाला कोई नहीं मिला। मुझे आज तक पता नहीं चला कौन लोग मुफ्त की डायरी बांटते हैं। और क्‍यों...। पहले पिता जी प्रिसीपल थे तो ढेरों सुंदर डा‍यरियां प्रकाशक दे जाते थे। पर उनके रिटायर के बाद कोई डायरी नहीं मिली पिछले कई सालों से। मैंने अपनी साली को एक डायरी खरीद कर दी थी 25 रूपये में। पिछले साल पत्‍नी को 12 रूपये की साधारण सी डायरी दी थी। पर खुद रद्दी कागज पर लिखता हूं। अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा , शायद नहीं।

4 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

मैं तो मांग लेता हूँ, ज्यादातर डायरियां उन लोगों को मिल जाती हैं जो उनमे खर्चों का हिसाब-किताब लिखते हैं.

सही भी है जब लिखने की बारी आती है तो कोई रद्दी सा कागज़ हीं मिलता है

Harkirat Haqeer ने कहा…

Bas ab aap dairy me kavita likh hi daliye...agali bar ham wahi kavita padhne aayege...!!

Ek ziddi dhun ने कहा…

mukul ji rough copy par keemti poems likhiye ji

khalid ने कहा…

mukul ji dairy ki ya dila di maine bhi ek dairy li thib samne rehte te ek babu ji se woh abhi mere paash hai pata nahi kya kya likh hai us par loge diye jakhm aap ni khusiya kai baate hai jo ek dam ansuljhi hai woh bhi likhi thi ab babu ji nahi r5ehe par woh dairy hai aur unme lipti khuch yaade hai jo bhul janan chheta hun kuch hamesa yaad rakhna chheta hun ......