गुरुवार, 19 मार्च 2009

यह तारों की मदि्धम आंच है जो करोंडों बरस तक मरती नहीं - मंगलेश डबराल की कविताएं


मंगलेश डबराल की कविताओं में विचारधारा और उसको जिलाए रखने का करूण प्रयास एक तारे की तरह टिमटिमाता रहता है। यह तारों की मदि्धम आंच है जो करोंडों बरस तक नहीं मरती। कविता का कठजीव है यह जिसके प्राण इंतजार में टिमटिमाते रहते हैं। यह इंतजार होता है विचारों के जीवनक्रिया में बदलने का इंतजार। यह कठजीव खामोशी से समय का भार सहता उसमें उपजते विचारों व नामों को चुनता चलता है और खुद को अतीत के विरोधपत्र में बदल डालता है। उनकी दुख शीषZक कविता को देखें-
लोग छोडकर जाते हैं घर द्वार
अनजान दुनिया में भटकते निरूदेश्य
रोटी के बदले में बदल देते अपने नाम और विचार
मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूं
सर पर एक भारी गठरी उठाए हुए
मैं थामता हूं, गिरते हुए को
बचाए रखता हूं खामोशी को

मैं एक विरोधपत्र हूं
जिस पर उनके हस्ताक्षर हैं जो अब नहीं हैं
मैें सहेज कर रखता हूं उनके नाम आने वाली चिटि्ठयां
मैं दुख हूं
मुझमें एक धीमी कांपती हुई रोशनी है

पिछले दशकों में हिन्दी कविता पर रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का घटाटोप छाया रहा है। मंगलेश की कविता इस घटाटोप को चीर कर शमशेर-मुक्तिबोध-नागार्जन की कविता पीढी से जुडने की कािशश करती दिखती है। मंगलेश का एक दुख वह भी है जो मुक्तिबोध केा सलता रहता था- जीवन क्या जिया, वाला दुख। अपनी एक कविता में वे उसे इस तरह व्यक्त करते हैें- कहीं मुझे जाना था नहीं गया/कुछ मुझे करना था नहीं किया। मुक्तिबोध को ऋतुराज आदि कई कवियों ने याद किया है , उन्हें याद करते मरणोपरांत कवि कविता में मंगलेश लिखते हैं-
और बीडी का धुआं भरता रहा
उसके चेहरे की झुरिZयों में
उसकी नौकरियां छूटती रहीं
और वह जाता रहा बार-बार सभा के बाहर
गौर से देखों तो वह अब भी
जाता हुआ दिखाई देता है

दिल्ली के कवियों की एक मजबूरी हो जाती है कि जनता से बनती दूरी के लिए वे एक विकल्प तैयार करते हैं। रघुवीर सहाय राजनीति केा तो विष्णु खरे फिल्मों को अपना वैकल्पिक आधार बनाते हैं मंगलेश संगीत को ओ चुनते दिखते हैं। संगतकार,रचना प्रक्रिया,अमीर खां आदि कविताएं इसका उदाहरण हैं। इन कविताओं में मंगलेश दूर के सुहावने ढोल होने के भीतर की पीडा को अभिव्यक्त करते हैं।गुणी ढोलकिया केशव अनुरागी की पीडा को वे इस तरह आवाज देते हैं-
लेकिन मैं हूं एक अछूत,कोन मुझे कहे कलाकार
मुझे ही करना होगा आाजीवन पायलागन
महाराज, जय हो सरकार

मंगलेश राजनीतिक रूप से सजग रचनाकार है। अपने समय और समाज के विकास क्रम पर उनकी नजर रहती है और इधर की कविताओं ताकत की दुनिया, यह नंबर मौजूद नहीं आदि में वे इन चीजों पर अपने ढंग से विचार भी करते हैं। मौजूदा समय की क्ररता को रेखांकित करते संकलन की भूमिका में वे लिखते भी हैं- यह क्रूरता उस समय भी दिखी जब अमीरों को अमीर राहत, और गरीबों को गरीब राहत दी जा रही थी।हिंदू राहत अलग थी,मुसलमान राहत और दलित राहत अलग।
यूं कविता और कवि की बाबत उनकी राय यह है कि - लिखी जाने के बाद वह रचनाकार को छोड देती है, उससे मुक्त और निवैZयक्तिक हो जाती है , उससे दूर चली जाती है। आगे देरिदा को कोट करते वे लिखते हैं कि - कविता में किसी शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता, बल्कि वह शब्द वही वस्तु होता है जिसके लिए वह शब्द प्रयुक्त किया गया है। कुल मिलाकर मंगलेश की चिंता है कि भ्रष्ट सत्ता-राजनीति ही सबसे बडा रोजगार है जिसमें लोग पूरी अश्लीलता से लगे हुए हैं।


अभिनय

एक गहन आत्मविश्वास से भरकर
सुबह निकल पड़ता हूँ घर से
ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ
एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ
वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी
एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ
वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत
एक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँ
वह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो
जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा
वे कहते हैं अरे आप टीवी पर दिखे थे एक दिन

बाज़ारों में घूमता हूँ निश्शब्द
डिब्बों में बन्द हो रहा है पूरा देश
पूरा जीवन बिक्री के लिए
एक नई रंगीन किताब है जो मेरी कविता के
विरोध में आई है
जिसमें छपे सुन्दर चेहरों को कोई कष्ट नहीं
जगह जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदले
जनाब एक पूरी फ़िल्म है लम्बी
आप ख़रीद लें और भरपूर आनन्द उठाएँ

शेष जो कुछ है अभिनय है
चारों ओर आवाज़ें आ रही हैं
मेकअप बदलने का भी समय नहीं है
हत्यारा एक मासूम के कपड़े पहनकर चला आया है
वह जिसे अपने पर गर्व था
एक ख़ुशामदी की आवाज़ में गिड़गिड़ा रहा है
ट्रेजडी है संक्षिप्त लम्बा प्रहसन
हरेक चाहता है किस तरह झपट लूँ
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार ।
(1990)
पुरानी तस्वीरें
पुरानी तस्वीरों में ऐसा क्या है
जो जब दिख जाती हैं तो मैं गौर से देखने लगता हूँ
क्या वह सिर्फ़ एक चमकीली युवावस्था है
सिर पर घने बाल नाक-नक़्श कुछ कोमल
जिन पर माता-पिता से पैदा होने का आभास बचा हुआ है
आंखें जैसे दूर और भीतर तक देखने की उत्सुकता से भरी हुई
बिना प्रेस किए कपड़े उस दौर के
जब ज़िंदगी ऐसी ही सलवटों में लिपटी हुई थी

इस तस्वीर में मैं हूँ अपने वास्तविक रूप में
एक स्वप्न सरीखा चेहरे पर अपना हृदय लिए हुए
अपने ही जैसे बेफ़िक्र दोस्तों के साथ
एक हल्के बादल की मानिंद जो कहीं से तैरता हुआ आया है
और एक क्षण के लिए एक कोने में टिक गया है
कहीं कोई कठोरता नहीं कोई चतुराई नहीं
आंखों में कोई लालच नहीं

यह तस्वीर सुबह एक नुक्कड़ पर एक ढाबे में चाय पीते समय की है
उसके आसपास की दुनिया भी सरल और मासूम है
चाय के कप, नुक्कड़ और सुबह की ही तरह
ऐसी कितने ही तस्वीरें हैं जिन्हें कभी-कभी दिखलाता भी हूँ
घर आए मेहमानों को

और अब यह क्या है कि मैं अक्सर तस्वीरें खिंचवाने से कतराता हूँ
खींचने वाले से अक्सर कहता हूँ रहने दो
मेरा फोटो अच्छा नहीं आता मैं सतर्क हो जाता हूँ
जैसे एक आइना सामने रख दिया गया हो
सोचता हूँ क्या यह कोई डर है है मैं पहले जैसा नहीं दिखूंगा
शायद मेरे चेहरे पर झलक उठेंगी इस दुनिया की कठोरताएं
और चतुराइयाँ और लालच
इन दिनों हर तरफ़ ऐसी ही चीजों की तस्वीरें ज़्यादा दिखाई देती हैं
जिनसे लड़ने की कोशिश में
मैं कभी-कभी इन पुरानी तस्वीरों को ही हथियार की तरह उठाने की सोचता हूँ
वसंत
इन ढलानों पर वसन्त
आएगा हमारी स्मृति में
ठंड से मरी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित करता
धीमे-धीमे धुंधवाता ख़ाली कोटरों में
घाटी की घास फैलती रहेगी रात को
ढलानों से मुसाफ़िर की तरह
गुज़रता रहेगा अंधकार

चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख
फिर उभरेगा झाँकेगा कभी

किसी दरार से अचानक
पिघल जाएगी जैसे बीते साल की बर्फ़
शिखरों से टूटते आएंगे फूल
अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज़
छटपटाती रहेगी
चिड़िया की तरह लहूलुहान
(रचनाकाल : 1970)

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