बुधवार, 18 मार्च 2009

बस कंडक्‍टर और बाइबिल - रोजनामचा

मैं और केशव डीटीसी की बस में चढे और सात का टिकट ले कंडक्‍टर के आगे वाली सीट पर बैठ गया। केशव का साथ नया नया था तो हम लगातार पत्रकारिता,देश और राजनीति आदि पर बहस करते जा रहे थे। तभी मेरी सीट के पीछे से एक हाथ हमारे बीच बढा और बाइबिल की छोटी सी किताबनुमा कापी सामने दिखाई दी। एकाध सेकेंड की सोच विचार के बाद मैंने वह किताब ले ली। केशव भी हैरान सा देख रहा था । मुझे लगा कि पीछे कोई ईसाई धर्म का प्रचार‍क होगा। हमने उसे देखने की जहमत नहीं उठायी। बस किताब को उलटने पलटने लगा। चश्‍मा मैंने लगाया नहीं था सो किताब के छोटे अक्षर दिख नहीं रहे थे। बीस साल पहले एक दुकान से बाइबिल खरीदी थी मैंने और पढी भी थी सो इस किताब में रूचि नही थी। सो किताब उलटते हुए मैं सोच रहा था कि इसका क्‍या किया जाए। चूंकि घर ले जाने पर कचरे में बढोतरी होती । यूं ही समीक्षा का काम होने से किताबे जरूरत से ज्‍यादा आती रहती हैं ओर उन्‍हें मित्रों को देना पडता है। केशव की भी रूचि नहीं दिख रही थी मैंने पीछे मुडकर देखा और पहचानने की कोशिश की कि किसने यह किताब दी है।
तो कंडक्‍टर सीधेपन से मुस्‍कराया। मैंने कहा कि यह किताब मैंने पढ रखी है यह मेरे पास है । किताब लेते हुए उसने कहा - यह कोई नया धर्म है शायद ,इसे वे फैलाना चाहते हैं, मैंने सोचा आपलोग पढने लिखने वाले लोग हैं शायद आपके किसी काम की हो। मैं हंसा। उसकी भोली मुखमुद्रा से लगा रहा था कि वह जताना चाह रहा है कि उसे सही गलत का अंदाजा नहीं कि मुझे किताब देकर उसने कोई गलती तो नहीं की। उसने बेमन से किताब रख ली। किसी प्रचारक ने उसे सौंप दी होगी अपनी डयूटी के तहत।

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