कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 1 मार्च 2009

कौन मक्‍कार उन्‍हें दिखाता है जंगल की तरह - कुमार मुकुल


श्रीकांतजी के बहाने - कुछ संस्‍मरण
श्रीकांत के साथ रहकर मैंने जाना कि पत्रकारिता एक ठीम वर्क है और इस रूप में वह सत्‍ता है , जन की सत्‍ता किसी भी सत्‍ता के मुकाबिल एक ठोस सत्‍ता। पत्रकार कोई सर्वज्ञानी शख्सियत तो है नहीं कि वह सारी दुनिया की खबर रखें हां अपने इस टीमवर्क की बदौलत वह सबको काबू में रखता है। वह जनता के पत्रों को आकार देता है, वह पत्रकार है। इस रूप में वह जन से जुड़ी तमाम विरादरियों से जुड़ा होता है। श्रीकांत से जुड़ी उस विरादरी से जुडकर अनजाने ही मैं भी जनता की उस ताकत का हिस्‍सेदार हो गया, अब मेरी आवाज में भी दम आने लगा,बातों की विश्‍वसनीयता बढने लगी।
जेपी यादव,के बालचन,प्रियरंजन भारती,अजय कुमार,प्रबल महतो और अन्‍य दर्जन भर पत्रकार इस टीम के हिस्‍से थे। यह टीम खबरों का चरित्र तय करती थी। इसके लिए मार तमाम बहसें होती थीं। किसी भी खबर को दबा पाना संभव नहीं था क्‍योंकि एक जगह अगर संपादक खबर दबा दे तो दूसरी जगह उसका आना तय होता था फिर उस अखबार को भी अगले दिन उस खबर को जगह देनी होती थी जिसे वह अपने निजी आग्रह में कम आंक रहा था। इस टीम वर्क के चलते जन की सामान्‍य खबरें भी बडी हो जाती थीं और बाजार में उछाली जा रही खबरों का कद यह टीम छोटा कर देती थी।
श्रीकांत जब लालू प्रसाद को हीरो बना रहे होते थे तो दरअसल वे लालू के पीछे की जनता को जगह दे रहे होते थे। लालू प्रसाद के नाटक में जो जनता की छवियां थीं उसे ही वे आगे बढाते थे। राजनीतिकों को यह भरम हो सकता है कि वे बडे अदाकार है पर जनता सबसे बडी अदाकारा है इसे वह बराबर उन्‍हें महसूस कराती रहती है। पर जब मूल्‍यांकन करना होता था तो वहां श्रीकांत जन की ओर झुक जाते थे। इस तरह वे अपनी राजनीतिज्ञों से जुडी छवि को बराबर साफ करते रह पाते थे। नतीजा जब उन्‍हें लालू प्रसाद से सबसे जुडा देखा जा रहा था तभी उनकी पहली किताब आई,बिहार में चुनाव -जाति बूथ लूट और हिंसा, इस किताब के कुछ पन्‍ने पटना हाई कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर लालू प्रसाद की सरकार के खिलाफ दिए गए एक फैसले में उद्धत किए थे।
यही पत्रकारिता की कला थी। जिसके श्रीकांत महारथी थे। इस तरह यह टीम अपने समय की राजनीति को तय भी करती थी जनता के पक्ष में। इस टीम वर्क के कई मजेदार परिणाम आते थे। तब मैं अमर उजाला के लिए पटना से रपटें लिखा करता था। एक बार जब अखबार के कानपुर एडीशन के संपादक और अग्रज कवि वीरेन डंगवाल ने मुझे कानपुर बुलाया तो मुझे यह देख हैरत हुई कि वहां के रिपोर्टर मुझे लेकर उत्‍साहित थे,वे पूछ रहे थे कि मैंने पटना में रहते हुए कलकत्‍ता में पकडे गए चारा घोटाले से जुडे एक आइएएस की गिरफतारी की खबर कलकत्‍ता के रिपोर्टर से पहले कैसे लिखा दी थी। तो यह था टीम वर्क का नतीजा। टीम वर्क के चलते हमारी खबरें खाली और अश्‍लील नहीं हाती थीं और हम जनता का सही चेहरा दिखा पाते थे और ऐसा नहीं कर पाने वालों को कवि आलोक धन्‍वा की तरह उंगली दिखाते हुए टोक पाते थे - वे नील के किनारे किनारे चल कर यहां तक आयी थीं ...कौन मक्‍कार उन्‍हें जंगल की तरह दिखाता है ...।
मेरे घर में मेरी बेरोजगारी को लेकर हमेशा मुझे नीचा दिखाया जाता था निकम्‍मा...। तो वही दौर था कि मैं भी कुछ कंपटीशन आदि क्‍यों नहीं कंपीट करता। इसी दौरान बीपीएससी का प्रश्‍नपत्र अगले दिन मेंरे हाथ लगा। देखा तो उसमें दर्जनों गलतियां थीं। मैंने तब नवभारत में संवाददाता रहे प्रबल से इसकी चर्चा की तो उन्‍होंने झटके सो कहा कल लिखकर दो तो -जरा देखें। तब मैं किसी अखबार में नहीं था। फीचर लिखा करता था पर खबरों के लिए तो किसी अखबार से जुडना होता था। पर प्रबल के कहने पर मैंने बीपीएससी के प्रश्‍नपत्र की गलतियां लिखकर रपट के रूप में दे दीं प्रबल को और अगले दिन मुझे यह देखकर हैरत हुयी कि अखबार के पहले पन्‍ने पर बाटम लीड के रूप में वह खबर छपी थी और बाईलाइन में मेरा नाम चस्‍पॉं था। मैं तो भीतर से गदगद हो गया। बाद में पता चलाकि उस खबर के आधार पर बीपीएससी ने हिन्‍दी माध्‍यम से परीक्षा देने वालों को कुछ नंबर एक्‍स्‍ट्रा दिए। तो यह था टीम वर्क का नतीजा।

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