कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है- कुमार मुकुल

धूमिल ने लिखा है – भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है। इधर हिन्‍दी के लेखक, कवि और पत्रकार जिस तरह भाषा को बरत रहे हैं उसे देखकर उसकी बधिया बैठती ही नजर आ रही है। केदारनाथ सिंह हमारे प्रिय कवियों में हैं पर उनके यहां भी जब एक कविता में पढा कि मुकुट की तरह उड़े जा रहे थे पक्षी तो जी उन्‍मन हो गया। अब मुकुट कैसे उड़ता है यह कीमियागिरी तो हिन्‍दी के कवि ही दिखा सकते हैं। वैसे हमारे संपादक आलोचक भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। अब प्रभाकर श्रोत्रिय को ही देखिए , भाषा के मर्मज्ञ हैं पर पिछले सालों में जिस तरह के संपादकीय लिखे हैं उन्‍होंने, उसे पढकर पैर पीट लेने का मन करता है। नया ज्ञानोदय के संपादकीयों में तो उन्‍होंने हद ही कर दी थी। पत्रिका के अंक 12 के संपादकीय में एक पंक्ति है - ... मेरे साहित्‍य ज्ञान पर स्‍याही कैसे फेर दी। ज्ञान पर स्‍याही कैसे फेरी जाती है अब यह कला तो उन लेखक बंधु से सीखनी पड़ेगी जिनका जिक्र श्रोत्रिय जी ने किया है। पर श्रोत्रीय जी आप भी तो ज्ञान पर झाड़ू ही फेर रहे हैं। इसी तरह अंक 3 में वे लिखते हैं – सारे देश ... छत पर खड़े खड़े यह तमाशा देखते हैं...। ...भर भरी दोपहर दोपहरी में ...गरीब देशों का की हाय-हाय...। अरे बाबा देशों को इस तरह छतों पर खड़ा करने की तरकीब कहां से सीखी आपने।
अब हमारे विद्वतजन अगर ऐसी भाषा लिखेंगे तो नयी जमात तो गुल खिलाएगी ही। नतीजतन वे दुर्लभ गंगा,हर घडि़यां,हर पानी,अतल जंगल जैसे बहुमुखी प्रयोग कर हिन्‍दी जगत का मान बढाने से क्‍यों बाज आएं। अब इन महानुभावों की वेदना शब्‍दों में सोचती है। कैसे, नया ज्ञानोदय के पाठक अर्थों में सोचकर बताएं तो इन लेखकों का मार्गदर्शन हो। उस समय के नया ज्ञानोदय में और भी सिद्ध जुमले मिलते हैं जैसे सबसे वरिष्‍ठ पीढ़ी से अभी कल लिया गया साक्षात्‍कार आपको वहां मिलेगा तो स्‍त्री को सदा के लिए मार दिया जाता भी पाएंगे आप। किसी को थोड़ी देर के लिए कैसे मार दिया जाता है यह कोई बताएगा हमें। यहां मजेदार है कि श्रोत्रिय जी खुद अपने ही एक संपादकीय में लिखते हैं - ... अब भाषा को भ्रष्‍ट करने में अंतरराष्‍ट्रीय शक्तियां लगी हुई हैं। इसी तरह हमारे चर्चित युवा कवि हैं प्रेमरंजन अनिमेष। जब उन्‍हें भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार मिला तो मैंने पुरस्‍कृत कविता पढी कि देखें किस कोने से पुरस्‍कृत किया है तो कविता पढते ही वह अधम कोना दिख गया। यूं अनिमेष के यहां अजूबे कम नहीं हैं। मिटटी के फल शीर्षक कविता संकलन में एक पंक्ति है- ...कुछ भी खाकर करती है गोबर पवित्र।आजकल पालीथीन खाकर गायें क्‍या कर रही हैं इस पर तो पर्यावरण विद ही बता सकते हैं। इसी तरह एक कवि के यहां जब पढा कि तलुओं को नींद आ रही है तो मेरी दृष्टि में मोच पड़ गयी और मैंने उसी क्षण अपनी इस नवागंतुक मोच का कापीराइट करा लेने की सोची, क्‍यों कि कल को वेदों की तरह मेरी कविताओं का कापीराइट भी जर्मनी वाले करा लें तो।इसी तरह अपने मीठे स्‍वाभाव के कविमित्र हेमंत कुकरेती के यहां भी कम झोल नहीं मिला। वहां मुझे क्रूर जबड़े,विकल मेज और स्‍तब्‍ध सभा भवन मिल गये फिर तो मेरी बल्‍ले बल्‍ले हो गयी। अरसा पहले जब अनामिका जी को पृथ्‍वी को रोटी की तरह बेलते पाया था तो सोचा था कि यह तो उनका विशेषाधिकार है और लगता है शरदरंजन शरद ने उन्‍हीं से छूट लेकर पृथ्‍वी को रेत पर दौड़ाने की ठान ली। जब कवि आलोचक इस तरह भाषा की बधिया बैठा रहे हों तो पत्रकार तो उससे आगे जाएंगे ही। पटना के लोकप्रिय दैनिक में एक बार एक खबर छपी साठ बोल्‍ड में- ...बाघ ने अमुक की हत्‍या की। बाघ मारता है या हत्‍या करता है यह तो विद्वतजन ही समझा सकते हैं। कल को आप इस खबर का इंतजार के कि भूस्‍खलन ने हजारों लोगों की हत्‍या की। इसी तरह हैदरबाद के एक दैनिक में पटना के एक संवाददाता ने खबर लिखी- ... लालू प्रसाद के निकटस्‍थ उनके पुत्र ने...। मैंने सोचा गलती से सूत्र की जगह पुत्र लिखा गया होगा पर आगे देखा कि पुत्र का नाम भी दर्ज था।

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