कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

ऎश्वर्य तो तुम्हें नहीं देगा यह जीवन - सुदीप बनर्जी


ऎश्वर्य तो तुम्हें नहीं देगा यह जीवन
लगातार भटकते दुनिया भर में
तुम रह जाओगे अपने जीवन में

याद रह जाएगी कोई एक कविता
अपना आख़िरी दिनों का उदास चेहरा
उपहास करते दरख़्तों का दिन-रात उगना
जड़ों की शिराएँ तुम्हारे काँपते पैरों से
धरती के मर्मस्थल तक
आजीवन क्लान्ति के क्लेश पहुँचाती हुईं

ऎश्वर्य तो नहीं ही फिर भी
भाषाएँ नहीं होती खलास ।

2 टिप्‍पणियां:

ravindra vyas ने कहा…

मुझे उनकी कविताएं अच्छी लगती हैं। उन्हें श्रद्धांजलि।

Ek ziddi dhun ने कहा…

mujhe unke jaane ka pata nahi chala. ap unkee kuchh aur kavitayen deejiyega