कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

प्रेम के बारे में


प्रेम के बारे में

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आंखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में

कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज-ब-रोज चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म सांसों की तरह
कि इन सांसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाजार कर दूं
आखिर क्यूं चाहूं मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्श
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूं।

2 टिप्‍पणियां:

एस. बी. सिंह ने कहा…

कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें।

बहुत सुंदर........ बहुत सुंदर...

sandhyagupta ने कहा…

Prem ki gahri, nishkalush anubhuti
aur vartmaan samay ki vikrit soch ko ek saath abhivyakt karti is jivant rachna ke liye badhai.
Mere blog se apne pasand ki koi bhi rachna aap karvan par le sakte hain.