कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 19 नवंबर 2008

दो तत्‍व अनंत हैं-ब्रह्मांड और मानवीय मूर्खता - आईंस्‍टीन


किशोरों के लिए विचारों और भावों की श्रृंखला - मेखला

हृदय का स्‍नेह गाडकर
नहीं रखा जाता है ...
प्‍यार करो तो प्‍यार करो
क्‍या आगा पीछा
- त्रिलोचन
मेखला शासकीय कन्‍या उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालय,करौंदीग्राम, जबलपुर की स्‍कूली पत्रिका है,जिसके पहले पन्‍ने पर महाकवि त्रिलोचन की ये पंक्तियां अंकित हैं। पत्रिका के भीतरी कवर पर हरिशंकर परसाई का एक गद्यांश है जिसका सार है - कि व्‍यक्ति की चेतना उसके सामाजिक अस्तित्‍व से बनती है...व्‍यक्ति की कोई स्‍वतंत्र चेतना नहीं हाती। कवि ,कथाकार विमल कुमार से जब परसों मिला यूएनआई में तो उन्‍होंने इस पत्रिका की चर्चा करते कहा कि एक स्‍कूल से ऐसी अद्भुत पत्रिका निकल सकती है यह मैंने सोचा नही था।
मेखला के संपादक उस स्‍कूल के सहायक शिक्षक डॉ उदयकान्‍त झा हैं। यह मेखला का तीसरा अंक है। एक सार्थक पत्रिका निकालने के अपने जोखिम हैं सो उदयजी और उनकी टीम को भी यह जोखिम उठाना पड़ रहा है। मेखला के पिछले दोनों अंकों पर करीब चारसौपचास पत्र आए थे जिसे स्‍कूल से कुछ षडयंत्रकारियों ने गायब करा दिया। पर उदय जी हिम्‍मती आदमी हैं और आशावान हैं कि यह मेखला ऐसे ही बढती रहेगी।
मेखला का पहला ही लेख नैनो टेक्‍नालॉजी पर है। इस आलेख में व्‍याख्‍याता अजय दुबे बताते हैं कि नैनो की सहायता से कैंसर जैसी बीमारी से भी निजात पाया जा सकता है। दूसरे आलेख में प्रधानाध्‍यापिका कुसुम कुरचानिया विज्ञान या भगवान नामक लेख में अपने ढंग से ईश्‍वर के होने ना होने की बहस को सामने रखते हुए अंत में कहती हैं - कि शायद वह ईश्‍वर हो या उसी का एक रूप हो। खैर ये उनके निजी विचार हैं यूं इस आलेख के मध्‍य में मनोहर बिल्‍लोरे की पंक्तियां मौजूं हैं-
खुद का
कोई विकल्‍प नहीं
खुदा भी नहीं।
मेखला में सामग्री प्रचुर है और उद्धरोंणों से तो पत्रिका पटी है तमाम कवियों की पंक्यिां और विचारकों के विचार इसे किशोंरों के लिए एक जरूरी पत्रिका के रूप में सामने लाते हैं। एक जगह आईंस्‍टीन की पंक्तियां हैं - दो तत्‍व अनंत हैं-ब्रह्मांड और मानवीय मूर्खता और मैं ब्रह्मांड के बारे आश्‍वश्‍स्‍त नहीं हूं।

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