कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 5 नवंबर 2008

फिर भी टपकाए राल ढोलकिया - कुमार मुकुल


आह ढोलकिया वाह ढोलकिया
उूंची तेरी निगाह ढोलकिया

धारे जन का साज ढोलकिया
दे दल्‍लों को आवाज ढोलकिया

पाता है इक लाख ढोलकिया
उड़ाए जन की खाक ढोलकिया

गालियों से परहेज हो कैसा
वह अगड़ों की शाल ढोलकिया

सवर्णें की ढाल ढोलकिया
ताने जन की पाल ढोलकिया

रंगभेद की बीण बजाकर
लगा लेता चौपाल ढोलकिया

उड़ाए रंग गुलाल ढोलकिया
तू तो बड़ा दलाल ढोलकिया

कहने को बेबाक ढोलकिया
ताके गरेबां चाक ढोलकिया

उड़ाए मत्‍ता माल ढोलकिया
फिर भी टपकाए राल ढोलकिया

कू-सु कर्मों का लेखा रखता
पंडित का पूत कमाल ढोलकिया

पानी कैसा भी खारा हो
गला लेता तू दाल ढोलकिया
आह ढोलकिया ............

4 टिप्‍पणियां:

पुनीत ओमर ने कहा…

मस्त है ये ढोलकिया

Kath Pingal ने कहा…

क्‍या ये कविता आपने खुद अपने ऊपर लिखी है श्रीमान...

ishq sultanpuri ने कहा…

vah dholakiya...vah dholakiya.......
...................................
...................................
.....shandar.......

sandhyagupta ने कहा…

aapka karvaan yun hi badta rahe. Shubkamnaayen.