कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

दुश्‍मन की छाया से लड़ता राजनीतिज्ञ - वि.पी.सिंह


मैं दुश्‍मन की छाया से लड़ रहा था - कविता - वि.पी. सिंह
कैसे भी वार करूं
उसका सर धड़ से अलग नहीं होता था

धरती खोद डाली
पर वह दफन नहीं होता था
उसके पास जाउं
तो मेरे ही उपर सवार हो जाता था
खिसियाकर दांत काटूं
तो मुंह मिटटी से भर जाता था
उसके शरीर में लहू नहीं था
वार करते करते मैं हांफने लगा
पर उसने उफ नहीं की

तभी एकाएक पीछे से
एक अटटहास हुआ
मुड़कर देखा तब पता चला
कि अबतक मैं
अपने दुश्‍मन से नहीं
उसकी छाया से लड़ रहा था
वह दुश्‍मन , जिसे अभी तक
मैंने अपना दोस्‍त मान रखा था।

मैं अपने दोस्‍त का सर काटूं
या उसकी छाया को
दियासलाई से जला दूं।

पटना की अपनी यात्रा में नवंबर 1987 में वि.पी ने यह कविता लिखी थी,तब राजीव गांधी की सरकार को अपदस्‍थ करने का अपना उपक्रम वे आरंभ कर चुके थे।

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