रविवार, 28 सितंबर 2008

सफेद चाक हूं मैं - कुमार मुकुल

समय की
अंधेरी
उदास सड़कों पर
जीवन की
उष्‍ण, गर्म हथेली से
घिसा जाता
सफेद चाक हूं मैं

कि
क्‍या
कभी मिटूंगा मैं

बस
अपना
नहीं रह जाउंगा

और तब

मैं नहीं

जीवन बजेगा
कुछ देर

खाली हथेली सा
डग - डग - डग ...

5 टिप्‍पणियां:

chavanni ने कहा…

apna mailid den.
aapse ek aagrah karna hai chavanni ko...
chavannichap@gmail.com

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी रचना, वाह!! बधाई.

hakim ने कहा…

खाली हथेली सा
डग - डग - डग ...

वाह! क्या बात है.. निसंदेह एक उम्दा अभिव्यक्ति

Madurai citizen ने कहा…

empty......
बहुत गहरी रचना, वाह!!

sandhyagupta ने कहा…

समय की
अंधेरी
उदास सड़कों पर
जीवन की
उष्‍ण, गर्म हथेली से
घिसा जाता
सफेद चाक हूं मैं
Atyant bhavpurna .
guptasandhya.blogspot.com