कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 31 अगस्त 2008

तेरे अंदर का झूठ - कुमार मुकुल

तुझे लगे
कि दुनिया में
सत्‍य
सर्वत्र
हार रहा है

समझो
तेरे अंदर का झूठ
तुझको ही
कहीं मार रहा है।

4 टिप्‍पणियां:

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

bahut khhhhoob bindas . dhanyawad.

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

छोटी और सुंदर!

श्रद्धा जैन ने कहा…

wah kya baat kahi hai
bhaut chhoti si pankti main bhaut akatya baat kahi hai

हकीम जी ने कहा…

चार लाइनों ने ही मुक्कमल इब्तिहाज का नशा दे दिया .....यकीनन ये एहतिराम लब्ज है...