सोमवार, 25 अगस्त 2008

कोई भी पूजा - कुमार मुकुल

किसी ऊंचाई पर रहो
किसी वर्ग में
अन्त में आओगे
धरातल पर
वही देगी ठौर

हाशिया पर पड़े लोगों की
अंगुलियां पकड़कर ही
जा सकोगे किसी ऊंचाई पर

झुिग्गयों से निकल
निर्माणधीन इमारतों के चारो ओर
घूम-घूमकर
जब-तक हगेंगे नहीं
भवन-निर्माता मजूरों के बच्चे
कोई भी पूजा
तुम्हारी आलीशानियत को
शुद्ध नहीं करेगी

पहले उनके कुत्ते मूतेंगे
तुम्हारी जमीन पर
तब तुम्हारे बुल-डाग्स के लिए
बनेगी अटारी।

2 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

सार्थक यथार्थ को अभिव्यक्त करती कविता।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी रचना, वाह!! बधाई.