कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

चरवाहे शहंशाह बन सकते हैं - कुमार मुकुल

चरवाहे शहंशाह बन सकते हैं बने हैं शहंशाह
शहंशाह बन नहीं सकता चरवाहा चाहकर भी
तानाशाह बन सकता है वह

भोला-भाला व्‍यक्ति
बन सकता है पंडित ज्ञानी विराट
ज्ञानी हो नहीं सकता मूर्ख
पागल हो सकता है वह

आकाश छूती जमीन को
पाट सकते हो अटटालिकाओं से
खींच सकते हो
कई-कई और चीन की दीवार
उसे बदल नहीं सकते समतल भूमि में
खंडहर बना सकते हो
वहां बोलेंगे उल्‍लू।

5 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिय रचना है।बधाई।

चरवाहे शहंशाह बन सकते हैं बने हैं शहंशाह
शहंशाह बन नहीं सकता चरवाहा चाहकर भी
तानाशाह बन सकता है वह

Udan Tashtari ने कहा…

सटीक..वाह!

Smart Indian ने कहा…

अरे वाह, क्या बात कही है आपने.

हकीम जी ने कहा…

आप अच्छा शब्द तीर चलाते हो ....आपके बारे मे इतना ही कहुगा
जिन सवालो से आग लगती है
जिन सवालो तीर मे चुभते है
जिन सवालो से वक्त रूक जाये
उस फलक पे ये गीत क्यु गाये .....

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

बहुत सटीक बात कही है आपने