शनिवार, 12 जुलाई 2008

'ख' महाशय के किस्‍से - कुमार मुकुल


साहब की सोहबत

सुबह नहा धोकर कसरत करने के बाद 'ख' महाशय को लगा कि बाहर कोने में बैठना चाहिए, वहां ठंडी हवा होगी `रिल्के´ की कहानियों का अनुवाद हाथ में ले प्लास्टिक की एक कुर्सी उठाए आ गए एक पेड़ के नीचे । हां, यहां हवा तेज है । नहाने से अभी भीगे बालों से जब हवा लगी तो सिहरन सी हुई । फिर कुर्सी पर बैठे महाषय 'ख' किताब पलटने लगे । अचानक उन्हें लाने में खड़बड़-खड़बड़ की आवाज सुनाई दी । उन्होंने देखा कि सामने उगी लंबी घासों में धोबिन चिडि़यों का झुंड सक्रिय हैं ।

'ख' महाशय रूक कर उन्हें देखने लगे, वे उछल-उछल कर घास-पात को चोंच से उठा-उठाकर अपना भोजन तलाश रही थीं ।'ख' महाशय ने सोचा-अच्छा तो ये सुबह-सुबह काम शुरू कर देती है, तो-काम ही जीवन है अब 'ख' महाशय खुद की बावत सोचने लगे । उन्होंने उठकर इस तरह चिडि़यों सा कोई काम किया या नहीं । हां- उठा, हाथ-मुह धोया । नहाया-कसरत किया । अब पढ रहा हूं, पर इसमें चिडि़यों की तरह कोई मिहनत का काम तो नहीं हुआ
'ख' महाशय यह सोच ही रहे थे कि पड़ोसी का कुत्ता दीवार फान लॉन में आ गया । अरे, यह कैसे छूट गया । डरे से वे कुछ समझते कि कुत्ता भी लॉन में चिडि़यों की तरह कुछ ढूंढने लगा । तो, यह भी काम कर रहा है । पर, अरे यह तो घास खा रहा है- ताबड़तोड़ ।

थोड़ी सी घास चरने के बाद उसने कुछ विचित्र हरकतें कीं, फिर लॉन के ही एक कोने में उल्टी कर दी । वे हां-हां करते दौड़ा तब-तक कुत्ता दीवार फांद अपने बाड़े में जा चुका था । 'ख' महाशय सोंचने लगे तो यह कुत्ता काम करने नहीं उल्टी करने आया था । मतलब, साहबों की सोहबत । रात में ज्यादा खाना, साहब तो बाथरूम गये होंगे यह आया इधर ।

1 टिप्पणी:

advocate rashmi saurana ने कहा…

bhut achhi kahani, sikh deti hui. jari rhe.